गर्भावस्था के दौरान यूटीआई समस्या से कैसे निपटें?

How to deal with UTI problem during pregnancy in Hindi

Synopsis: गर्भावस्था के दौरान यूटीआई समस्या से कैसे निपटें? यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI in hindi ) की समस्या आख़िर गर्भावस्था के दौरान ही क्यों बढ़ जाती है ? इससे जुड़े प्रमुख लक्षण, गर्भावस्था के दौरान यूटीआई समस्या से बचाव के तरीके

मेरे सवाल के इस लेख में हम आपको बताने वाले है गर्भावस्था के दौरान यूटीआई समस्या से कैसे निपटा जा सकता है?

पर ग़ौर करने वाली बात यह है कि यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI in hindi ) की समस्या आख़िर गर्भावस्था के दौरान ही क्यों बढ़ जाती है ?

तो हम आपको बता दें कि, ई-कोलई (E-Coli) नाम के बैक्टेरियल इन्फेक्शन की वजह से  यूटीआई इन्फेक्शन (UTI infection) होने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। चूकि गर्भावस्था/ प्रेगनेंसी  के दौरान महिलाओं की बॉडी बहुत ज़्यादा सेंसिटिव होती है जिसके कारण यह समस्या उत्पन्न हो जाती है इसी दौरान गर्भ में भ्रूण (शिशु ) का विकास होना शुरू होने लगता है जिसकी वजह से ब्लेडर पर और यूरिनरी ट्रैक्ट पर प्रेशर पड़ता है जिसकी वजह से बेक्टेरिया आसानी से अंदर की तरफ ट्रेप हो जाता है या चला जाता हैं। आप नीचे दिए गए चित्र में देखकर इसे आसानी से समझ सकते है।

यही मुख्य कारण गर्भवती महिलाओं में UTI इन्फेक्शन की समस्या को पैदा करता है।

UTI कारण और उपचार

आइये जानते है

UTI इन्फेक्शन से जुड़े प्रमुख लक्षण

(Symptoms of UTI in Hindi)

  1. मूत्र (यूरिन) पास करते समय दर्द या जलन का अनुभव होना।
  2. बार-बार बाथरूम जाने का अहसास होना।
  3. अत्यधिक मात्रा में यूरिन का उत्पादन होना।
  4. कभी ज़्यादा मूत्र आना और कभी कम मूत्र आना ।
  5. मूत्र में अजीब सी बदबू का महसूस होना ।
  6. यूरिन पास करते टाइम खून का पेशाब के साथ दिखाई देना।
  7. पीले रंग की पेशाब का आना।
  8. बार-बार होठों का सूखना।
  9. पेशाब करते समय पेट के निचले हिस्से में ऐंठन और खिचाव का होना।
  10. शरीर में थकान और वीकनेस सा लगना।
  11. प्रेगनेंसी के समय यूरिन इन्फेक्शन से ग्रसित हो जाना।
  12. घंटो समय तक पेशाब को रोके रखना।
  13. महिलाओं में पीरियड्स ख़त्म होने के दौरान UTI इन्फेक्शन।
  14. डायबटीज़ या शुगर की समस्या हो जाने के दौरान।
  15. सेक्स के दौरान भी कई पुरुषों या महिलाओं में Urine Infection की समस्या हो सकती है।

अगर आपको इन सभी लक्षणों में से कोई भी लक्षण दिखाई पड़ते है तो तुरंत अपने डॉक्टर्स या गायनेकोलॉजिस्ट से संपर्क करें। जिससे आपको कन्फर्म हो जाये की कही आप UTI से ग्रसित तो नहीं है। अगर हो भी गए है तो वह आपको इसके उपचार के लिए कई विशेष सलाह देंगे।

वैसे तो यह इन्फेक्शन किसी को भी हो सकता है पर प्रेगनेंसी के समय UTI का खतरा बढ़ जाता है जिसका प्रभाव माँ और बच्चे दोनों पर पड़ता है यदि समय रहते इसका इलाज न किया जाये तो मिसकैरेज की नौबत भी आ सकती है और दुनियाँ में आने के पहले ही अपने बच्चे को खो सकती है इसलिए UTI की प्रॉब्लम को बिल्कुल भी लाइट न समझें और समय रहते ही इसका इलाज करवा लें।

अब जान लेते है गर्भावस्था के दौरान यूटीआई समस्या से बचाव के लिए आप कौन से कदम उठा सकते है।

जो निम्नलिखित है।

गर्भावस्था के दौरान यूटीआई समस्या से बचाव

(How to prevent UTI during pregnancy in Hindi)

1.

यह तो हम सभी जानते है UTI की प्रॉब्लम होते ही बार-बार यूरिन के लिए जाना होता है, हो सके तो जितनी बार आप वॉशरूम के लिए जाए आप अपने प्राइवेट पार्ट को ज़रूर से पानी की सहायता से धो लें या फिर टिशू पेपर का इस्तमाल करें।

 

2.

गर्भावस्था के दौरान अपने पेट का विशेष ध्यान रखे पर्याप्त मात्रा में पानी पीये,जिससे आपका पेट अच्छा साफ होगा और UTI की प्रॉब्लम होने की संभावना भी कम होंगी।

 

 

3.

पेट साफ रखने के लिए फाइबर युक्त आहार (सलाद) लें तथा विटामिन सी युक्त फलो को शामिल करे जैसे – अंगूर ,संतरा ,किवी ,तरबूज़ एवं सेब,अनार नियमित रूप से लें ।

 

 

4.

जितनी बार यूरिन/पेशाब आये उतनी बार जाये रोके बिल्कुल भी नहीं ज्यादा देर तक पेशाब को रोके रखना UTI की समस्या को बढ़ा सकता है। जिसका असर किडनी पर पड़ता हैं।

 

5.

UTI कि समस्या से बचने के लिए दवा का सही उपयोग केवल डॉक्टर या गायनेकोलॉजिस्ट के परामर्श के बाद ही करें जो वह जो दवाइयाँ सजेस्ट करें उन्ही को लें।

 

 

6.

अपने इंटरनल बॉडी पार्ट्स की साफ़ सफाई का विशेष ध्यान रखें, खासकर अंडरवियर को साफ रखें।

 

7.

अपनी बॉडी को हायड्रेट रखने के लिए और इन्फेक्शन /संक्रमण से बचाने के लिए नियमित रूप से नारियल पानी लें।

 

 

8.

ढ़ीले और सूती कपड़ो का चयन करें जिससे UTI के बचाव में मदद मिल सकें।

 

 

9.

मांसाहरी खाद्य पदार्थों से दूर रहे।

 

 

10.

गर्भावस्था के दौरान शरीरिक सबंध बनाने से अपने आपको दूर रखे क्यों कि संक्रमण का खतरा किसी भी रूप में हो सकता है।

 

इन सभी बातों को ध्यान में रखकर आप गर्भावस्था/प्रेगनेंसी के दौरान होने वाली यूटीआई समस्या (UTI problem in hindi) से बच सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (People also asked)

1.

गर्भावस्था के दौरान शरीरिक सबंध बनाने से अपने आपको दूर रखे क्यों कि संक्रमण का खतरा किसी भी रूप में हो सकता है।

 

गर्भावस्था के दौरान, यूरीनालिसिस और यूरिन कल्चर के माध्यम से यूटीआई की पहचान की जा सकती है। यूरीनालिसिस में मूत्र के रासायनिक घटकों की जांच की जाती है, जबकि यूरिन कल्चर में जीवाणुओं की पहचान की जाती है।

2.

गर्भावस्था में मूत्र पथ के संक्रमण का जोखिम कितने सप्ताह तक होता है?

 

मूत्र पथ संक्रमण (यूटीआई), जिसे मूत्राशय संक्रमण भी कहा जाता है, मूत्र पथ में एक प्रकार की बैक्टीरियल सूजन होती है जो महिलाओं में गर्भावस्था के छठवे (6th week) हफ्ते से गर्भावस्था के 24वें हफ्ते तक होती है। यही वह समय होता ही जिसमे UTI इन्फेक्शन होने का खतरा और अधिक बढ़ जाता हैं।

3.

गर्भावस्था के दौरान यूटीआई क्यों अधिक आम है?

 

गर्भावस्था के दौरान यूटीआई की समस्या अधिक आम हो जाती है क्योंकि महिलाओं के शरीर में हार्मोनल परिवर्तन होते हैं, जो मूत्र पथ के बैक्टीरियल विकास को बढ़ा सकते हैं। साथ ही, गर्भावस्था के दौरान यूरीन के प्रवाह में बदलाव और मूत्राशय के आकार में वृद्धि भी होती है, जिससे यूटीआई का खतरा बढ़ाता है।

4.

गर्भावस्था के दौरान यूटीआई का कारण क्या हो सकता है?

 

ग्रुप बी स्ट्रेप्टोकोकस ये बैक्टीरिया आमतौर पर आंत में पाए जाते हैं, जिनकी एक्टिवनेस गर्भावस्था के दौरान ज्यादा बढ़ जाती है जो यूटीआई का कारण बन सकता है।

 

जैसे-जैसे जिससे गर्भ बढ़ता जाता है ब्लेडर पर और यूरिनरी ट्रैक्ट पर प्रेशर पड़ता है जिसकी वजह से बैक्टेरिया आसानी से अंदर की तरफ प्रवेश कर जाता है जिसके कारण यूरेथ्रा से किडनी की तरफ यूरिन का प्रवाह बढ़ जाता है ब्लेडर का आकर भी धीरे-धीरे कम हो जाता है। और यूरेथ्रा भी डाइलेटेड होना शुरू कर देता है जिसकी वजह से इन्फेक्शन होने का खतराप्रेग्नेंसी के दौरन बढ़ जाता है।

आज के इस आर्टिकल में हमने आपको गर्भावस्था के दौरन होने वाली सबसे आम समस्या UTI इन्फेक्शन (UTI Infection in Hindi) जानकारी दी। आशा है यह सुझाव आपके लिए और किसी जरूरतमंद महिला जो UTI से जूझ रही है उनके लिए उपयोगी सिद्ध हो जरूर शेयर करें। आपके कुछ सुझाव हो वह भी हमें बताए।

प्रेगनेंसी में यूरिन इन्फेक्शन? प्रेगनेंसी में यूरिन इन्फेक्शन के लक्षण एवं कारण

(Urine Infection in Pregnancy in Hindi)

Synopsis: प्रेगनेंसी में यूरिन इन्फेक्शन UTI के लक्षण, यूरिन इन्फेक्शन के कारण, एवं परेशानियां

यह तो हम सभी जानते ही है कि गर्भावस्था हर महिला के जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग होता है और गर्भावस्था/प्रेगनेंसी के समय शरीर में कई परिवर्तन होते रहते है कुछ हार्मोनल बदलाव भी होते है जिसका असर हमारे पूरे शरीर पर होता है यहाँ तक की गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी पड़ता है। जिसमे प्रेगनेंसी के समय यूरिन इन्फेक्शन (Urine Infection in Pregnancy) का होना आम बात है।

Table of content

  • यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन(UTI) होता क्या है ?( What is Urinary Tract Infection UTI in Hindi) ?
  • प्रेगनेंसी के दौरान यूरिन इन्फेक्शन क्यों हो जाता हैं ?( Why do urine infections occur during pregnancy in Hindi) ?
  • प्रेगनेंसी के दौरान यूरिन इन्फेक्शन के लक्षण (Sympotms o(Pregnancy me Urine Infection)f UTI during pregnanacy)
  • प्रेगनेंसी के दौरान यूरिन इन्फेक्शन के कारण (Causes of UTI during pregnanacy)
  • प्रेगनेंसी के दौरान यूरिन इन्फेक्शन की जटिलता/ कॉम्प्लीकेशन्स (Complications of UTI in Hindi)
  • अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

अब आप सोच रहे होंगे…..  UTI (Urinary Tract Infection)

यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन होता क्या है ?

यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन एक प्रकार का ऐसा इन्फेक्शन है जो की योनि के अंदर होता है चुकी हमारे प्राइवेट पार्ट्स की त्वचा बहुत ही सेंसिटिव और संवेदनशील होती है जिसकी वजह से कई बार संक्रमण होने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है यह संक्रमण किसी को भी कही भी हो सकता है जिसकी प्रमुख वजह है बैक्टीरिया का अधिक मात्रा में उत्तेजित हो जाना और किसी पब्लिक प्लेस में वाशरूम का उपयोग कर लेना या फिर असुरक्षित यौन सबंध का बना लेना, जिसकी वजह से योनि मार्ग या बाहरी हिस्से में सूजन सी हो जाती है।

यूरिनरी ट्रैक्ट के संक्रमण या यूटीआई ब्लैडर संक्रमण से जुड़ा होता है, यूटीआई इन्फेक्शन आपके यूरिन पास होने वाले रस्ते के किसी भी हिस्से में हो सकता है ,जिसमे किडनी भी शामिल हो सकती है क्यों कि यूरिन बनाने का काम किडनी करती है, एक यूरेटर होता है जो की यूरिन/पेशाब को

ब्लैडर तक ले जाने का काम करता है , ब्लैडर वह हिस्सा होता है जहाँ पेशाब जमा होती है और मूत्रमार्ग से पेशाब/यूरिन आपके शरीर से बाहर निकालती है।

प्रेगनेंसी के दौरान यूरिन इन्फेक्शन क्यों हो जाता हैं ?

(Pregnancy me Urine Infection)

UTI जिसका पूरा नाम यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (Urinary Tract Infection) है। ऐसा जरुरी नहीं है की  यूरिनरी इन्फेक्शन (UTI infection) केवल प्रेगनेंसी के दौरान ही होता है कई बार ऐसा भी देखा गया है , जब आप किसी ऐसी जगह वाशरूम का इस्तमाल कर लेते है जिसकी काफी समय से सफाई नहीं हुई हो और आप उस जगह पेशाब कर लेते है और जाने अनजाने में आप  (UTI infection) का शिकार हो जाते है जिसकी वजह से आपको कई समस्याओं का सामना भी करना पड़ जाता है।

यही खतरा (Urine Infection Pregnacy) गर्भावस्था /प्रेगनेंसी के समय/दौरान और अधिकं बढ़ जाता है। जिसकी वजह से प्राइवेट पार्ट में खुजली और जलन भी होने लगती है जो एक गंभीर समस्या है।

(UTI infection during pregnancy)

(Urine Infection Pregnancy in Hindi)

प्रेगनेंसी में यूरिन इन्फेक्शन के लक्षण

(Sympotms of uti during pregnanacy )

प्रेगनेंसी के समय यूरिन इन्फेक्शन के कई लक्षण देखने को मिलते है।

(UTI)  यूरिन इन्फेक्शन एक नार्मल कंडीशन है जो प्रेग्नेंट महिलाओं में होती है। जिसमें यूरिन पास होने वाली जगह के किसी भाग में बैक्टीरिया का अधिक संक्रमण बढ़ जाता है। जिसकी वजह से यह इंफेक्शन तेजी से फैलने लगता है और किडनी और पेट के निचले हिस्से को प्रभावित करता है।

जिसमें कुछ लक्ष्ण प्रमुख है।

  • पेशाब /बाथरूम करते टाइम पेट के निचले हिस्से में दर्द होना ।
  • बार-बार पेशाब का आना।
  • कभी ज्यादा पेशाब का आना और कभी बहुत ही कम आना।
  • प्रेगनेंसी के दौरान अधिक पेशाब बनता है जिसका प्रभाव बच्चेदानी पर पड़ता है और अधिक बार पेशाब जाना होता है। पर अगर आप UTI इन्फेक्शन से ग्रस्त है तो आपके लिए
  • यह दर्द ओर अधिक बढ़ जाता है।
  • पेशाब से बदबू आना।
  • पीले रंग की पेशाब आना।
  • कई बार आपको लगेगा बाथरूम आ रही है पर आती नहीं है।
  • योनि में दर्द महसूस होना दुर्गन्ध का आना।
  • सेक्स/सम्भोग के दौरान दर्द का महसूस होना।
  • शरीर में थकावट महसूस होना ,किसी भी काम में मन नहीं लगना।

प्रेगनेंसी के दौरान यह सभी प्रमुख लक्षण है जो अक्सर महिलाओं में देखे गए है अगर आपको इनमें से कोई भी लक्षण नज़र आता है तो आप उसे नज़रअंदाज़ बिल्कुल न करें तुरंत अपनी गयनोकोलॉजिस्ट या डॉक्टर से सम्पर्क करें।

अगर समय रहते UTI यूरिन इन्फेक्शन को कंट्रोल कर लिया गया तो गर्भावस्था के दौरान आप बहुत सी समस्याओं और त्रुटियों  से बच सकते है। (UTI during pregnancy in hindi)

प्रेगनेंसी के दौरान यूरिन इन्फेक्शन के कारण

(Causes  of uti during pregnanacy)

गर्भवस्था के दौरान यूरिन इन्फेक्शन के कई कारण हो सकते है।

जो कुछ इस प्रकार है।

  • शरीर में हार्मोन्स का चेंज होना – यह तो हम सभी जानते है कि गर्भावस्था के समय माँ और शिशु दोनों का एक दूसरे से गहरा सबंध होता है माँ जो भी ग्रहण करेगी उसका पूरा पोषण बच्चे को मिलेगा पर कई बार न चाहते हुए भी UTI इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता हैं।
  • मूत्राशय थैली का बढ़ना – गर्भावस्था के दौरान मूत्र प्रोडक्शन अधिक मात्रा में होता है जिसकी वजह से बार-बार पेशाब जाने की इच्छा महसूस होती है क्यों कि बच्चे के वजन का भी मूत्राशय थैली पर प्रभाव पड़ता है जिसकी वजह से यूरिन पास करते टाइम नीचे की तरफ बहुत खिचाव और दर्द महसूस होता है।
  • मूत्र उत्सर्जन पथ में बदलाव – हमने अब तक बात की मूत्राशय थैली के विकसित होने की पर एक बदलाव और है जिसकी वजह से मूत्र संक्रमण गर्भावस्था के दौरान बढ़ जाता है क्यों कि गर्भाशय की दीवारों और मांसपेशियों पर दबाव मूत्र के रास्ते और पथ को बदल सकता है जिसके कारण UTI इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता हैं।
  • इन्फेक्शन की चपेट में तेजी से आना – रोग प्रतिरोधक क्षमता गर्भावस्था के दौरान कम होती है। (Causes of uti during pregnanacy) जिसकी वजह महिलायें यूरिन इन्फेक्शन की चपेट में आ जाती है और संक्रमण फैलने लगता है पेशाब जाते टाइम पेट के निचले हिस्से (योनि) में दर्द और ऐठन सी होती है। जो यूरिन इन्फेक्शन का प्रमुख कारण है।

प्रेगनेंसी के दौरान यूरिन इन्फेक्शन की  जटिलता (कॉम्प्लीकेशन्स)

(Complications of UTI in Hindi)

प्रेगनेंसी (Pregnancy complications) के दौरान अगर यूरिन इन्फेक्शन के कॉम्प्लीकेशन्स की बात की जाय तो उसमें “सेप्सिस”आमतौर पर प्रमुख है क्यों कि सेप्सिस ऐसा कवकीय संक्रमण जो बैक्टीरिया या वायरल से उत्पन्न होता है और किसी भी उम्र के लोगों को कभी भी  कही भी प्रभावित कर सकता हैं। अगर समय रहते इसका इलाज न किया गया तो प्रेगनेंसी/गर्भावस्था में कई तरह के कॉम्प्लीकेशन्स आ सकते है।

आइये जानते है..

प्रेगनेंसी के दौरान होने वाले कुछ प्रमुख यूटीआई कॉम्प्लीकेशन्स (UTI Complications in hindi) के विषय में –

  1. प्रीमेच्योर प्रसव/डिलीवरी का जल्दी होना प्रेगनेंसी के दौरान अगर आपको यूटीआई इन्फेक्शन (UTI infection in pregnancy) हो जाता है तो इससे जल्दी प्रसव याने प्रीमेच्योर डिलीवरी (समय से पहले )डिलीवरी होने का खतरा बढ़ जाता है।
  2. हाई बीपी की समस्या – यूटीआई इन्फेक्शन (UTI infection in pregnancy) का खतरा प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं में बीपी हाई होने की समस्या को बड़ा  सकता हैं। जो प्रेगनेंसी के समय आपकी जान को जोखिम में डाल सकता है।
  3. किडनी प्रॉब्लम – UTI infection के कारण पेशाब का प्रोडक्शन ज्यादा होने लगता है और बार-बार वाशरूम जाने का महसूस होता है जिसके कारण मूत्र उत्सर्जन में दर्द और पीड़ा होती है। कभी ज्यादा पेशाब का आना जिसे (पॉलियूरिया) और कभी कम पेशाब का आना जिसे (अनूरिया) हो सकता है। जो की किडनी से सम्बंधित है।
  4. पेट के निचले हिस्से में सूजन – UTI infection के कारण कई बार पेट के निचले हिस्से में सूजन आ जाती है जिसके कारण मांसपेशियों में खिचाव होता है और नींद आना भी मुश्किल हो जाता है। शरीर में पानी की कमी का होना भी UTI इन्फेक्शन का मुख्य कारण है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

  1. क्या UTI का संक्रमण गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है

मूत्र संबंधी सर्जरी कराने या आपके मूत्र पथ की जांच  कराने जिसमें कई चिकित्सा उपकरण शामिल होते हैं, दोनों ही यूटीआई संक्रमण होने के ख़तरे को बढ़ा सकते हैं। लेकिन ठीक से इलाज किया जाए तो निचले हिस्से याने मूत्र पथ के संक्रमण होने का खतरा कम हो जाता है  लेकिन इलाज न किए जाने पर, यूटीआई गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है।

  1. गर्भावस्था की मूत्र संबंधी जटिलताएँ क्या हैं

गर्भवती महिलाओं में सबसे आम समस्या मूत्र पथ की जटिलता (कठिनाई) पायलोनेफ्राइटिस है, जो लगभग सभी महिलाओ में गर्भधारण के 0.5-3% में होती है। इस स्थिति में यूरिन पास करने में दर्द और पीड़ा महसूस होती है।</p

  1. बार-बार पेशाब क्यों आ रहा है

बार-बार पेशाब आने के कई अलग-अलग  कारण हो सकते है जिसमें डायबटीज़ ,किडनी प्रॉब्लम , ब्लेडर प्रॉब्लम या प्रोस्टेट की समस्या भी हो सकती है। इसके आलावा गर्भावस्था में  मूत्र पथ के संक्रमण का लक्षण हो सकता है क्यों कि गर्भाशय के निचले हिस्से में UTI इन्फेक्शन के कारण सूजन बढ़ जाती है और यूरिन का प्रोडक्शन भी ज़्यादा हो जाता है जिसे उत्सर्जित होना महत्वपूर्ण हो जाता है।

  1. क्या पेशाब रोकने से गर्भधारण में समस्या हो सकती है?

गर्भावस्था के दौरान तेजी से पेशाब का आना (एयूआर) एक कॉमन प्रॉब्लम है। अगर समय रहते इसका इलाज नहीं किया गया, तो इससे मूत्राशय की थैली फट सकती है, गर्भपात/मिसकैरेज का खतरा हो सकता है, या यहां तक कि गर्भाशय फट भी सकता है जो मां और भ्रूण दोनों के स्वास्थ्य की दृष्टि से खतरे में डालते हैं।इसलिए प्रेग्नेंसी /गर्भावस्था के दौरान बिल्कुल भी शर्म न करें। जितनी बार वाशरूम जाना पड़े उतनी बार जाए।

  1. गर्भावस्था के दौरान पेशाब करने में क्या समस्याएँ होती हैं?

आपने अक्सर नोट किया होगा छींकते, खांसते और हंसते समय हमारी मांसपेशियां भी एक्टिव कंडीशन में आ जाती है और उनमे हल्का खिचाव भी महसूस होता है पर जब आप प्रेगनेंट होती है और इनमें से कसी भी स्थिति से गुजरती है तो आप पेशाब/यूरिन के तेज बहाव को रोकने में असमर्थ हो जाती हैं। क्योंकि पेल्विक फ्लोर की मांसपेशियां (मूत्राशय के आसपास की मांसपेशियां) बच्चे के जन्म की तैयारी के लिए थोड़ा आराम करती हैं। जो पेशाब को नहीं रोक पाती।

आशा है, अब आप प्रेगनेंसी के दौरान होने वाले यूटीआई इन्फेक्शन (UTI Infection during in pregnancy ) से जुड़ी सभी जानकारियों एवं इससे जुड़े बहुत से सवालों के जवाब हासिल कर चुके होंगे ।

अगर आपको हमारा यह आर्टिकल पसंद आया हो तो अपने विचार हमारे साथ जरूर से साझा करें साथ ही किसी और विषय के बारे में जानने की रुचि रखते हैं तो उसे कमेंट बॉक्स में लिखें।

Reference links

https://www.momjunction.com/hindi/pregnancy-me-urine-infection/

https://hindiparenting.firstcry.com/articles/pregnancy-ke-dauran-uti-infection-hona-प्रेगनेंसी-के-दौरान-यूटीआई-इन्फेक्शन-होना/

आईवीएफ (IVF) क्या होता है, कैसे होता है ? आईवीएफ प्रक्रिया, फायदे ,नुकसान

Synopsis: आईवीएफ (IVF) क्या होता है(What is IVF in Hindi), आईवीएफ का  full form,  आईवीएफ कैसे होता है? आईवीएफ प्रक्रिया(IVF process in hindi), फायदे ,नुकसान, उपचार (IVF Treatment hindi), सावधानियाँ

माँ बनना हर किसी शादी-शुदा स्त्री या महिला के लिए बड़े ही सौभाग्य की बात होती है, परन्तु आज के समय में  कुछ ऐसे कपल भी है जो बच्चे की चाह तो रखते है परन्तु कई बार उनके हाथ निराशा ही लगती है।

बांझपन एक पुरुष या महिला के प्रजनन प्रणाली से संबंधित एक रोग है, जिसके पीड़ित होने पर नियमित रूप से 12 महीने या उससे अधिक समय तक असुरक्षित यौन संबंध के बावजूद भी गर्भावस्था नहीं होती है।ऐसे में (IVF)तकनीक का सहारा लिया जाता हैं जो उन लोगो के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं।

Table of Content

  • आईवीएफ (IVF) क्या है,क्यों कराया जाता हैं? (Full Form of IVF in Hindi)
  • इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के लिए खुद को तैयार कैसे करें? (Preparing for IVF Treatment in Hindi)
  • इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) की आवश्यकता किस स्थिति में होती है? (In which situations is IVF required in hindi)
  • आईवीएफ उपचार से पहले पुरुष की जाँच (Tests For Man Before IVF Treatment In Hindi)
  • आईवीएफ उपचार से पहले महिला की जाँच (Tests For Woman Before IVF Treatment In Hindi)
  • आईवीएफ उपचार की प्रक्रिया (IVF Treatment Step By Step In Hindi)(IVF Process in hindi)
  • इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के फायदे/लाभ (Benefits Of IVF Treatment In Hindi)
  • इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के साइड इफेक्ट्स/जोख़िम (Side Effects Of IVF Treatment In Hindi)
  • (Things To Do After IVF Treatment In Hindi)
  • इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के बाद सावधानियाँ (Precautions after In Vitro Fertilization (IVF) in hindi)
  • आपके सवाल जवाब (Answers to your questions)

आईवीएफ (IVF) क्या है, क्यों और कैसे होता है?  (Full Form of IVF in Hindi)

सामान्य बोल चाल की भाषा में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (in vitro fertilization) को आईवीएफ कहा जाता है (Full form of IVF in hindi is इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) जिसका मतलब होता है आर्टिफिशल तरीके से फर्टिलाइजेशन की प्रक्रिया कर किसी “भ्रूण” को जन्म देना।

अब आपके लिए यह जानना भी ज़रूरी है की आखिर आईवीएफ (IVF) कराया क्यों जाता हैं …..

यदि किसी कपल को नॉर्मल प्रोसेस याने सेक्स के दौरान गर्भ नहीं ठहरता है,और वह सब तरफ से हताश हो चुके होते है तब उन्हें आईवीएफ (IVF) का ख्याल आता है क्यों किआईवीएफ के दौरान, महिला के अंडाणुओं और पुरुष के शुक्राणुओं को लैब में मिलाकर भ्रूण बनाया जाता है।

जब भ्रूण तैयार हो जाता है, तो उसे महिला के गर्भाशय में रखा जाता है और यह भ्रूण नॉर्मल शिशु/बेबी की तरह विसकसित होना शुरू कर देता है जिसे  ही आईवीएफ (IVF)  तकनीक कहा जाता है। हर साल दुनिया भर में लगभग 80 लाख शिशु आईवीएफ (IVF) के जरिए पैदा होते हैं।

इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के लिए खुद को तैयार कैसे करें? (Preparing for IVF Treatment in Hindi)

इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के लिए खुद को तैयार करना बहुत ज़रूरी है आइये जानते है कुछ विशेष महत्वपूर्ण बिंदुओं को विस्तार से।

जिसमें सबसे पहले है:-

  1. मानसिक तौर पर खुद को तैयार करेंआईवीएफ (IVF) शब्द आपको सुनने में आसान लगता होगा पर यह उतना आसान प्रोसेस नहीं है,अगर किन्ही कारण वश आपको आईवीएफ(IVF) कराना पड़ रहा है तो मानसिक तौर पर खुद को प्रबल ज़रूर कर लें।
    1. तनाव को कम करने के लिए योग और ध्यान का अभ्यास करें।
    2. सहायक समर्थन के लिए परिवार और दोस्तों से बातचीत करें।
  2. स्थानीय डॉक्टर से सलाह लें- आईवीएफ (IVF) के लिए एक अच्छे इन विट्रो फर्टिलाइजेशन सेंटर की तलाश कर ले जहाँ आपको अच्छे रिजल्ट्स देखने को मिले हो, उसके बाद आपके स्थानीय डॉक्टर से आईवीएफ की संभावना और तैयारी के लिए सलाह प्राप्त करें।
  3. स्वास्थ्य की देखभाल करें- अपने शरीर को शारीरिक तौर पर स्वस्थ रखें। अच्छे स्वास्थ्य के लिए  नियमित रूप से व्यायाम करें, स्वस्थ खानपान का पालन करें,हरी पत्तेदार सब्जियों तथा फलों का सेवन करें।
  4. अपने वज़न का ध्यान रखें- अच्छे स्वाथ्य के साथ-साथ अपने वज़न पर भी ध्यान देते रहें, अगर आप अच्छा प्रोटीन युक्त भोजन, मिनरल्स और विटामिन्स से भरपूर डाइट ले रहे है और अचानक से वजन ज़्यादा बढ़ने लगे या कम होने लगे तो तुरंत डॉक्टर्स से संपर्क करें
  5. तंबाकू और शराब का सेवन न करें-अगर आप सुखद मातृत्व जीवन चाहती है, तो धूम्रपान और शराब के सेवन से खुद को दूर रखें।
  6. नियमित दिनचर्या का पालन करें-सही समय पर सोने की और उठने की आदत डालें और व्यायाम ,प्राणायाम को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लें।
  7. पूर्व-गर्भाधान चिकित्सा संभावना -डॉक्टर की सुझावनुसार, आपको पूर्व-गर्भाधान चिकित्सा करानी पड़ सकती है जो आईवीएफ के प्रयासों को सफल बना सकती है। उसके लिए खुद को तैयार रखें।
  8. आईवीएफ के प्रक्रिया को समझेंआईवीएफ की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए डॉक्टर से सलाह लें और अपनी जानकारी को बढ़ावा दें।
  9. यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि आप अपने डॉक्टर से सभी संभावनाओं और आवश्यकताओं के बारे में खुल कर चर्चा कर चुके है ताकि सही और सटीक दिशा में कदम बढ़ाएं जा सके।

इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) की आवश्यकता किस स्थिति में होती है? (In which situations is In Vitro Fertilization (IVF) required in hindi / IVF treatment in hindi)

आईवीएफ (IVF) इलाज से पैदा हुए शिशु को ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ भी कहा जाता है। आईवीएफ एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है, और इसमें ध्यान रखने के लिए कई महत्वपूर्ण बातें हैं।

एंडोमेट्रियोसिस और आईवीएफ उपचार (Endometriosis & IVF Treatment In Hindi)

एंडोमेट्रियोसिस एक प्रकार की ऐसी स्थिति या विकार है जिसमें महिला के शरीर में गर्भाशय के पास एक और नई  झिल्ली विसकसित हो जाती है और यह झिल्ली सामान्य तौर पर या तो गर्भाशय के बाहर, गर्भाशय के पास, या अन्य शरीर के अंगों में हो सकती है जो फैलोपियन ट्यूब, अंडाशय, और गर्भाशय पर असर डाल सकते हैं।

रिसर्च के अनुसार एंडोमेट्रियोसिस से प्रभावित महिलाएं आईवीएफ के माध्यम से सुरक्षित रूप से गर्भधारण कर सकती हैं।

अस्पष्ट बांझपन और आईवीएफ उपचार (Unexplained Infertility & IVF Treatment In Hindi)

अस्पष्ट बांझपन, एक स्थिति है जिसमें महिला के गर्भाधान के ना होने कोई स्पष्ट कारण नहीं होता। यानी, चिकित्सक नहीं बता सकते कि इस बांझपन का कारण क्या है। इस स्थिति में, जोड़ी अविफल गर्भाधान के प्रयासों में होती है, लेकिन गर्भधारण नहीं होता।

इस समस्या के समाधान के लिए कई बार आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) जैसे तकनीकी उपायों का सहारा लिया जा सकता है।

यूटेराइन फाइब्रॉइड्स और आईवीएफ उपचार  (Uterine Fibroids & IVF Treatment In Hindi)

फाइब्रॉइडस “गैर-कैंसरीय” होते है, जो की गर्भाशय के अंदर मांसपेशियों (Muscles) में होने वाले रूपरेखात्मक बदलाव (मोरफोलॉजिक्ल) के कारण होते हैं जिन्हे ट्यूमर या गांठ कहते है और संक्षिप्त में इन्हें फाइब्रॉइडस कहा जाता है और इसका सामना किसी भी महिला को प्रेगनेंसी या बेबी प्लान करने के दौरान पड़ सकता है।

परंतु रिसर्च के अनुसार यूटेराइन फाइब्रॉइड्स से पीड़ित महिला आईवीएफ की मदद से सफलतापूर्वक गर्भधारण कर सकती हैं। आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) एक उपचार विकल्प हो सकता है। आईवीएफ में, शुक्राणु और अंडाणु दोनों बाहर निकाले जाते हैं और फिर यह दोनों हाई एफिशिएंसी  के साथ मिलाए जाते हैं ताकि गर्भाधान की कोशिशें की जा सकें।

ओव्यूलेशन से संबंधित विकार और आईवीएफ उपचार (Ovulation Disorders & IVF Treatment In Hindi)

ओव्यूलेशन एक महिला की शरीरिक प्रक्रिया है जिसमें अंडानुवांछना के समय अंडाणु किसी विशेष समय में उत्पन्न नहीं होता है, जिसके परिणाम स्वरूप गर्भधारण करना मुश्किल हो सकता है। इसमें महिलाओं के अंडाणु मात्रा या उत्पन्न होने की गति में अनियमितता होती है, जिससे गर्भाधान की संभावना में कमी होती है।

यह एक प्रजनन समस्या है जिसका समाधान आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) जैसे तकनीकी उपायों के माध्यम से किया जा सकता है।

फैलोपियन ट्यूब में ब्लॉक या खराबी होना और आईवीएफ उपचार

(Blockage In Fallopian Tube & IVF Treatment In Hindi)

फैलोपियन ट्यूब में ब्लॉकेज या खराबी का होना एक प्रजनन समस्या है जिसमें महिला के फैलोपियन ट्यूब (जो अंडाणुओं को गर्भाशय की ओर लेता है) में किसी कारण से रुकावट आ जाती है या ट्यूब में खराबी होती है। जिसके परिणाम स्वरूप स्वाभाविक रूप से गर्भधान नहीं हो पाता है।

जिन महिलाओं को फैलोपियन ट्यूब में प्रॉब्लम होती है या उसमें किसी समस्या के कारण गर्भधारण करने में दिक्कत होती है, उनके लिए आईवीएफ एक बेहतर उपचार विकल्प के रूप में उपयुक्त है।

आनुवंशिक रोग और आईवीएफ उपचार  (Genetic Disorder & IVF Treatment In Hindi)

आनुवंशिक विकार में व्यक्ति को विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करने में कठिनाई हो सकती है और कई बार इसका वास्ता शिशुओं और वंशजों के साथ जुड़ा भी होता है।

आनुवंशिक विकार एक प्रकार की स्वाभाविक या विकासात्मक अशान्ति है जो की आनुवंशिक व्यक्ति की जीवनशैली और फिजिकल हेल्थ को प्रभावित कर सकता  है। उनके लिए आईवीएफ एक बेहतर उपचार है।

स्पर्म की गुणवत्ता में कमी होना और इसके साथ ही आईवीएफ उपचार (Low Sperm & IVF Treatment In Hindi)

यदि किसी पुरष में स्पर्म की मात्रा की कमी हो या कम संख्या के शुक्राणु हो जो ओवोलुशन के लिए बिल्कुल भी पर्याप्त न हो ऐसी कंडीशन में उन शुक्राणुओं का अंडाणुओं के साथ संगम करना मुश्किल हो सकता है।

इस प्रकार के बांझपन का इलाज करने के लिए, आईवीएफ के साथ-साथ आईसीएससी का भी सहारा लिया जाता है।

आईवीएफ उपचार से पहले पुरुष की जाँच (Tests For Man Before IVF Treatment In Hindi)

आईवीएफ उपचार/ट्रीटमेंट (IVF Treatment In Hindi) शुरू करने से पहले, प्रजनन विशेषज्ञ कुछ विशेष प्रकार की जांचें करने का सुझाव देते हैं और इसके पूर्व, पुरुष को निम्नलिखित जांचों से गुजरना होता है।

जो निम्नलिखित हैं…

  • (वीर्य विश्लेषण) सीमेन एनालिसिस
  • हॉर्मोन टेस्टिंग
  • वासोग्राफी
  • जेनेटिक टेस्टिंग
  • अल्ट्रासाउंड
  • एमआरआई
  • टेस्टिकुलर बायोप्सी

इन सभी जांचों का परिणाम प्राप्त होने के बाद, डॉक्टर महिला की जाँच करते हैं।

आईवीएफ उपचार से पहले महिला की जाँच

(Tests For Woman Before IVF Treatment In Hindi)

आईवीएफ (IVF) का ट्रीटमेंट(IVF Treatment In Hindi)  शुरू करने के पहले पुरुष के साथ-साथ, महिला की जाँच भी की जाती है। इस जांच के माध्यम से डॉक्टर को बांझपन के सटीक कारण और अन्य संबंधित समस्याओं की पुष्टि करने में सहायता मिलती है।

डॉक्टर/चिकित्सक के साथ परामर्श (Consultation With Doctor For IVF Treatment In Hindi)

यह तो हम सभी जानते ही है की नार्मल तरीके से बच्चा पैदा करने या बेबी प्लान करने में अक्सर महिलाओं को ज्यादा तकलीफ नहीं उठानी पड़ती है, पर वही अगर आपको नॉर्मल तरीके से बेबी प्लान करने में कठिनाई हो रही है, तो आप  प्रजनन विशेषज्ञ यानी फर्टिलिटी डॉक्टर (Fertility doctor in Hindi) से मिलते हैं और वह आपको आपकी मेडिकल हिस्टरी के आधार पर आईवीएफ प्रक्रिया (IVF Processin hindi) का सहारा लेने की बात समझाते है जिसमें डॉक्टर आपके सभी सवालों का उत्तर देंगे और आपकी सहायता करेंगे।

हो सकता है, कुछ विशेष परीक्षण की भी सलाह दें। जो आपको करवाना पड़े। सभी प्रकार के परीक्षणो से  गुजरने के बाद की आईवीएफ प्रक्रिया (IVF Process in hindi) शुरू की जाती है।

ओवेरियन स्टिमुलेशन (Stimulation of Ovaries for IVF Treatment in Hindi)

देखा जाये तो हर महीने एक महिला की ओवरी से एक अंडा बहार निकलता है परन्तु यह आईवीएफ प्रक्रिया (IVF Process) के लिए पर्याप्त नहीं होता,ओवेरियन स्टिमुलेशन एक ऐसी चिकित्सा प्रक्रिया/तकनीक है जिसमें महिला के अंडाशय को प्रेरित करने के लिए महिला को विशेष दवाएं और इंजेक्शन्स दिए जाते है ताकि उसके अंडाशय में अधिक संख्या में अंडे उत्पन्न हो सकें। इससे आईवीएफ प्रक्रिया के लिए अधिक सफलता की संभावना बढ़ती है।

ओवेरियन स्टिमुलेशन का मेन उद्देश्य यह होता है कि एक समय में एक से अधिक संख्या में अंडे उत्पन्न किये जाए और उन्हें शुक्राणुओं के साथ मिलाकर भ्रूण का निर्माण हो सकें जिससे आईवीएफ की प्रक्रिया में अधिक उत्तर मिल सके।

आपको यह भी बता दे अंडाशय कोप्रेरित करने के लिए डॉक्टर महिला को 3-6 या 5-12 दिनों तक हार्मोनल दवाएं और इंजेक्शन प्रदान करते हैं। इसकी समय अवधि महिला की आयु और ओवरऑल स्वास्थ्य पर निर्भर करती है।

ट्रिगर इंजेक्शन (Administration of Trigger Injection in IVF Treatment in Hindi)

यह इंजेक्शन अंडाशय में परिवर्तन करने में मदद करता है। इस प्रक्रिया के बाद 33-36 घंटों में, डॉक्टर एग रिट्रीवल, जिसे अंडाशय से अंडे निकालने के लिए उपयोग किया जाता है, शुरू करते हैं।

अंडे निकालना (Egg Retrieval For IVF Treatment In Hindi)

आईवीएफ उपचार के लिए अंडे निकालना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन इन हिंदी ) ट्रीटमेंट  के दौरान, डॉक्टर एक महिला के अंडाशय से अंडे निकालने के लिए एग रिट्रीवल प्रक्रिया को शुरू करते हैं। यह एक महत्वपूर्ण स्टेज है जो महिला के शरीर से एक या एक से अधिक अंडे प्राप्त करने के लिए किया जाता एग रिट्रीवल प्रक्रिया या प्रोसेस  की शरुआत  विशेषज्ञ डॉक्टर  द्वारा की  जाती  है। इसके लिए, महिला को स्थानीय या सामान्य एनेस्थिया दिया जाता है ताकि वह प्रोसीजर के  दौरान आराम से महसूस करें।

इस प्रक्रिया में, डॉक्टर एक एग रिट्रीवल नीडल का उपयोग करके अंडाशय की दीवार को प्रवेश करते हैं और अंडे को धीरे-धीरे निकालते हैं। निकाले गए अंडे तत्काल लैब में भेजे जाते हैं, जहां उन्हें उपयुक्त प्रक्रिया के लिए तैयार किया जाता है।

स्पर्म लेना (Sperm Selection of IVF Treatment In Hindi)

आईवीएफ उपचार के लिए शुक्राणु का चयन किया जाता है आईवीएफ (इनविट्रो फर्टिलाइजेशन इन हिंदी ) ट्रीटमेंट  के दौरान, शुक्राणु का चयन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया या प्रोसेस है जिसका उद्देश्य सही संख्या और स्वस्थ शुक्राणुओं को चयन करना होता है ताकि इन्हें एग्ग (अंडा) के साथ मिलाकर इनविट्रो फर्टिलाइजेशन के लिए उपयुक्त बनाया जा सके।

आपके लिए यह जनना भी ज़रूरी है कि जिस दिन एग निकाले जाते है उसी दिन सबसे हाइली एक्टिव शुक्राणुओं का चयन भी किया जाता है ताकि अच्छे रिजल्ट्स मिल सके।

शुक्राणु चयन प्रक्रिया/प्रोसेस में, लैब तक पहुंचे शुक्राणुओं को विश्लेषित किया जाता है। इसके लिए, शुक्राणुओं को एक विशेष प्रणाली में प्लेस किया जाता है, जिससे उनकी गति, आकार, और अन्य विशेषताओं को निरीक्षण किया जा सके।

फर्टिलाइजेशन (Fertilisation For IVF Treatment In Hindi)

आईवीएफ उपचार के लिए शुक्राणु का चयन किया जाता है आईवीएफ (इनविट्रो फर्टिलाइजेशन इन हिंदी ) ट्रीटमेंट  के दौरान, शुक्राणु का चयन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया या प्रोसेस है जिसका उद्देश्य सही संख्या और स्वस्थ शुक्राणुओं को चयन करना होता है ताकि इन्हें एग्ग (अंडा) के साथ मिलाकर इनविट्रो फर्टिलाइजेशन के लिए उपयुक्त बनाया जा सके।

आपके लिए यह जनना भी ज़रूरी है कि जिस दिन एग निकाले जाते है उसी दिन सबसे हाइली एक्टिव शुक्राणुओं का चयन भी किया जाता है ताकि अच्छे रिजल्ट्स मिल सके।

डॉक्टर एक इनक्यूबेटर में (जिसे अंडे और शुक्राणु का जोड़ा बनाने के लिए उपयोग किया जाता है) अंडा और शुक्राणु को संग्रहित करते हैं।

भ्रूण का विकास करना (Development of Embryos in IVF Treatment in Hindi)

आईवीएफ ट्रीटमेंट के दौरान, भ्रूण का विकास एक महत्वपूर्ण स्टेज है जो नवजात शिशु की उत्पत्ति की दिशा में कदम बढ़ाता है। इस स्टेज में संग्रहण और प्रदर्शन दोनों के रिजल्ट्स को देखा और परखा जाता है ताकि डॉक्टर/चिकित्सक शिशु के स्वास्थ्य की सबसे अच्छी देखभाल कर सकें।

आईवीएफ प्रक्रिया में, जब अंडाणुओं और शुक्राणुओं को संग्रहित कर एक साथ मिलाया  जाता  हैं तब फर्टिलाइजेशन की  प्रक्रिया/प्रोसेस शुरू हो जाती है  इसके बाद, उत्पन्न भ्रूण को इनक्यूबेटर में रखा जाता है जो उचित तापमान और महिला  के गर्भाशय की जटिलताओं को ध्यान में रखता है।

भ्रूण स्थानांतरण करना (Implantation of Embryo in IVF Treatment in Hindi)

आईवीएफ उपचार के दौरान भ्रूण स्थानांतरण सबसे महत्वपूर्ण और आखरी स्टेज होती है आईवीएफ ट्रीटमेंट की इस स्टेज  में, भ्रूण स्थानांतरण, उस समय किया जाता है जब विकसित भ्रूण गर्भाशय में स्थित होकर गर्भनाली की दीवार में स्थानांतरित/इम्प्लांट हो जाए, जिससे गर्भाधारण की प्रक्रिया शुरू हो सके।

यह स्टेज आईवीएफ के सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती  है, क्योंकि सही समय और सही स्थान पर भ्रूण का स्थानांतरण होना आवश्यक है ताकि गर्भाधारण संभव हो सके।इस स्टेज में, स्पेशल डॉक्टर्स  एक या एक से अधिक विकसित भ्रूणों को उच्चतम गुणवत्ता वाले भ्रूण को चयन करके गर्भनाली में स्थानांतरित करते हैं। इस प्रक्रिया को संग्रहण और लुट( collection and plunder) भी कहा जाता है।

यह एक छोटी प्रक्रिया है जिसे पूरा होने में 15-20 मिनट से अधिक समय नहीं लगता।

गर्भावस्था की जाँच करना (Pregnancy Testing Following IVF Treatment in Hindi)

यह सबसे अंतिम और आखरी स्टेज होती है लगभग 2 से 3 सप्ताह बाद आपको डॉक्टर से मिलना होता है जिसमे वह ब्लड/खून की जाँच करते है जिससे पता लगाया जा सके एचसीजी (hCG) की कितनी मात्रा आपके शरीर में है।

अगर आईवीएफ उपचार के बाद गर्भावस्था की जाँच पॉसिटिव आती है तो यह उन कपल के लिए बहुत ही ख़ुशी का क्षण होता है इसके बाद डॉक्टर उचित दवाइयाँ लेने का सजेशन देते है जिससे शिशु पूर्ण विकसित हो सके और आईवीएफ उपचार की प्रक्रिया कम्पलीट हो सके।

इन सभी स्टेजो से गुजरने के बाद की आईवीएफ उपचार की प्रक्रिया/ प्रोसेस (IVF Process/prkriya in hindi) पूर्ण होती है।

इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के फायदे/लाभ (Benefits Of IVF Treatment In Hindi)

आईवीएफ उन सभी माता पिता के लिए वरदान है जो माँ बाप बनने से चिंतित थे। पर आज के इस आधुनिक युग में कुछ भी असंभव नहीं है, आइये जानते है इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के फायदे/लाभ के विषय में जो निम्नलिखित है

  1. बांझपन का समाधान: आईवीएफ उपचार से बांझपन की समस्या का समाधान हो सकता है।
  2. अंडाशय स्वास्थ्य में सुधार: ओवेरियन स्टिमुलेशन से अंडाशय को स्वस्थ बनाए रखने में मदद हो सकती है।
  3. शुक्राणु चयन: आईवीएफ से शुक्राणु का चयन होने से उपचार की सफलता में मदद होती है।
  4. गारंटीत प्रेगनेंसी: आईवीएफ से गर्भाधारण की संभावना को बढ़ाया जा सकता है।
  5. जननांग संबंधित समस्याओं का समाधान: आईवीएफ से जननांग संबंधित समस्याओं का समाधान हो सकता है।
  6. जीनेटिक स्क्रीनिंग: जीनेटिक स्क्रीनिंग से बच्चे की स्वास्थ्य की पूर्वानुमान हो सकती है।

इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के साइड इफेक्ट्स/जोख़िम (Side Effects Of IVF Treatment In Hindi)

आईवीएफ के जितने अधिक फायदे है उतने जोख़िम/हानियाँ भी हो सकती है आइये जानते है इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के साइड इफेक्ट्स/जोख़िम/नुकसान के विषय में जो निम्नलिखित है।

  1. उच्च खर्च: आईवीएफ उपचार आपके लिए आर्थिक रूप से भारी हो सकते हैं, क्योंकि यह कई प्रक्रियाओं और टेस्टों को शामिल करता है, जिनमें भारी इलाज की लागत शामिल होती है।
  2. मानसिक तनाव: आईवीएफ का उपचार मानसिक तनाव और दबाव का कारण बन सकता है, खासकर जब उपचार की सफलता में कोई देरी होती है या समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
  3. एकाधिक गर्भाधारण की संभावना: आईवीएफ के उपचार के बाद, एकाधिक गर्भाधारण की संभावना बढ़ सकती है, जिससे स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
  4. तनाव, कब्ज और हल्के क्रैम्प्स: आईवीएफ उपचार के दौरान महिलाओं को तनाव, कब्ज, और हल्के क्रैम्प्स की संभावना हो सकती है
  5. जन्म के समय शिशु का वजन कम होना: आईवीएफ से प्राप्त गर्भधारण के दौरान, शिशु का वजन कम होने की संभावना हो सकती है, जिसके लिए डॉक्टर की निगरानी में विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
  6. हेवी वेजाइनल ब्लीडिंग: गर्भधारण के दौरान आईवीएफ से हेवी वेजाइनल ब्लीडिंग का सामना हो सकता है, जिसे तुरंत डॉक्टर से साझा करना चाहिए।
  7. दस्त और मतली: उपचार के कारण कई महिलाएं दस्त और मतली की समस्याओं का सामना कर सकती हैं, जिसके लिए उचित परहेज और उपचार की आवश्यकता हो सकती है।
  8. पेडू में दर्द और पेशाब में खून: आईवीएफ के दौरान पेडू में दर्द और पेशाब में खून का सामना हो सकता है, अगर ऐसा हो तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।

(Things To Do After IVF Treatment In Hindi)

इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के बाद सावधानियाँ (Precautions after In Vitro Fertilization (IVF) in hindi)<

आईवीएफ के बाद सावधानियाँ निम्न है कृपिया इन्हे ध्यान में रखें।

    1. आराम और विश्राम:आईवीएफ ट्रीटमेंट  के बाद, शारीरिक और मानसिक तौर पे खुद को रिलैक्स रखना चाहिए ,आराम करने का पूरा समय लेना चाहिए, ताकि शरीर और मन को पूरी तरह से आराम मिल सके।
    2. डॉक्टर की सलाह: डॉक्टर की सलाह पर नियमित रूप से निरीक्षण के लिए जाना चाहिए ताकि उपचार की प्रगति को निगरानी में रखा जा सके।
    3. स्वास्थ्य का ध्यान: आईवीएफ ट्रीटमेंट  के बाद,उचित पोषण, स्वस्थ खानपान, और स्वस्थ जीवनशैली का पालन करना चाहिए ताकि गर्भधारण में कोई दिक्कत ना हो सके।
    4. अवसाद और तनाव से बचाव: आईवीएफ ट्रीटमेंट  के दौरान और उसके बाद भी मानसिक तौर पर खुद का ख्याल रखने के साथ-साथ डिप्रेशन/अवसाद और तनाव से अपने आप को बचाना महत्वपूर्ण है, इसके लिए योग और मेडिटेशन का अभ्यास करना चाहिए जो आपकी सेहत के लिए फायदेमंद होगा ।
    5. नियमित फॉलो-अप: आईवीएफ ट्रीटमेंट के दौरान डॉक्टर के साथ नियमित फॉलो-अप और आवश्यक टेस्टों का पालन करना आवश्यक है ताकि यदि दिक्कतें हों, तो समय पर पहचाना जा सकें और उनका सही समय पर सही इलाज कर ठीक किया जा सकें।
    6. सेक्स से बचे – अगर हो सके तोआईवीएफ के बाद संभोग/सेक्स करने से बचे क्यों कि यह बहुत  ही  महंगी और विभिन्न प्रकार के टेस्टो से गुजर कर सक्सेस को हासिल करने वाली प्रणाली है, जिसमे आप एक स्वस्थ शिशु की चाह रखते है ज़रा सी लापरवाही आपके लिए भरी पड़ सकती है।
    7. नशीले पेय पदार्थो एवं धूम्रपान करने से बचे – अनियमित रूप से या बीच-बीच में  नशीले पदार्थो का सेवन करने से खुद को बचाए।
    8. मांसहारी भोजन बिलकुल न करे।
    9. भारी सामान की उठा पिटक करने से बचे।
    10. सप्ताह में कभी कबार ही नहाए।

    आईवीएफ उपचार के पश्चात, आपमें कई भावनात्मक और शारीरिक परिवर्तन हो सकते हैं। यदि आपको किसी भी प्रकार की चिंता या सवाल हो, तो कृपया अपने चिकित्सक या डॉक्टर से संपर्क करें और उन्हें अपनी समस्याओं के बारे में बताए और इसके निवारण के बारे में जाने।

आपके सवाल जवाब (Answers to your questions)

1. आईवीएफ का खर्च कितना होता है

आईवीएफ (IVF) का खर्च व्यक्ति और क्लीनिक के बीच भिन्न हो सकता है और यह कई कारणों पर निर्भर करता है, जैसे कि स्थान, उपचार की आवश्यकता, डॉक्टर की फीस, और विशेष चिकित्सा सुविधाएं। सामान्यत: आईवीएफ का खर्च लाखों रुपये तक हो सकता है।

2.आईवीएफ (IVF) कैसे किया जाता है?

आईवीएफ (IVF) एक ऐसी तकनीक है जिससे बच्चा पैदा करने में मदद मिलती है। इसमें, महिला को एक विशेष प्रकार की दवाएं  या इंजेकशन्स  दिए जाते है ताकि उसके अंडाशय से ज्यादा अंडे बनें। फिर ये अंडे निकाले जाते हैं और पुरुष के  शुक्राणु से मिलाए जाते हैं। इन अंडों और शुक्राणुओं को मिलाकर एक छोटा शिशु/बेबी/भ्रूण बनाया जाता है। फिर यह भ्रूण महिला के गर्भ में डाला जाता है ताकि वह गर्भाधारण कर सके। इस पूरी प्रक्रिया को आईवीएफ कहा जाता है।

3.आईवीएफ (IVF) में स्पर्म किसका होता है ?

आईवीएफ (IVF) में स्पर्म पुरुष का होता है। यह वह शुक्राणु होते हैं जो पुरुष के शुक्राणुसर्ग से प्राप्त किए जाते हैं और उन्हें उपयुक्त स्थान पर रखा जाता है ताकि उनका अंडानुक्रमण हो सके। इस प्रक्रिया में हाइली उत्तेजित शुक्राणु  का चयन किया जाता है, और फिर यह स्पर्म अंडे के साथ मिलाया जाता है ताकि फर्टिलाइजेशन हो सके और एक भ्रूण बन सके।

4.आईवीएफ (IVF) करने की ज़रूरत कब पड़ती है ?

आईवीएफ (IVF) करने की जरूरत तब हो सकती है जब इन सभी चीजों की कमी होगी जैसे-

बांझपन (Infertility): जब किसी युवा स्त्री या पुरुष को बांझपन का सामना करना पड़ता है और उन्हें प्राकृतिक रूप से गर्भधारण नहीं हो पा रहा हो, तो आईवीएफ का विकल्प पर विचार किया जा सकता है।

अंडानुक्रमण या अंडानुबंधन में समस्या: जब पुरुष के शुक्राणुओं का अंडानुक्रमण या अंडानुबंधन में समस्या होती है, तो इसमें सहायता के लिए आईवीएफ का इस्तेमाल किया जा सकता है।

अंडाशय के समस्याएं: महिलाओं में अंडाशय संबंधित समस्याएं, जैसे कि पॉलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (PCOS) या अंडाशय की अच्छी तरह से काम न करने की समस्या, आईवीएफ को एक विकल्प बना सकती है।

शुक्राणुओं की कमी: अगर पुरुष के शुक्राणु संख्या कम है तो आईवीएफ का उपयोग किया जा सकता है।

गर्भाशय में समस्या: गर्भाशय की समस्या, जैसे कि गर्भाशय के अंदर गांठें या गर्भाशय की नसें, भी आईवीएफ को आवश्यक बना सकती है।

इन मामलों में, डॉक्टर आईवीएफ को एक संभावना के रूप में समझेंगे और इसे करवाने का सुझाव देंगे।

5.इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के लिए फर्टिलिटी डॉक्टर का चयन कैसे करें ?

आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) के लिए फर्टिलिटी डॉक्टर का चयन या चुनाव करते समय यह ध्यान रखे कि आप कुशल और विशेषज्ञ चिकित्सक का चयन कर रहे हो ।

डॉक्टर का चयन करते समय उनके अनुभव, योग्यता, और उनकी सफलता दर का मूल्यांकन करें, साथ ही उनसे विस्तृत चर्चा करें ताकि आप अपने चिकित्सा योजना को समझ सकें और विशेषज्ञ की सुझावों का उपयोग कर सकें।

एक सच्चे और सहानुभूति भरे संबंध में विश्वास रखना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस यात्रा में सहयोग और समर्थन भी आवश्यक होता है।

आईवीएफ की जटिलताओं के अलावा, कुछ मामलों में आईवीएफ के गंभीर नुकसान (ivf k nuksaan) भी हो सकते हैं। इसमें मुख्य रूप से:

  • जन्मजात दोष से पीड़ित शिशु
  • ओवरी में कैंसर का हो जाना
  • गर्भपात का ख़तरा
  • एक्टोपिक प्रेगनेंसी की संभावना
  • प्रसव का समय से पहले हो जाना
  • ओवेरियन हाइपरस्टिमुलेशन सिंड्रोम आदि।

आशा है आपको इस आर्टिकल में आईवीएफ (IVF)  से सम्बंधित लगभग सभी  जानकारियाँ प्राप्त हो चुकी होंगी, आपके सवाल जवाब सेक्शन में हमने उन्ही प्रश्नो के जवाब आप तक पहुँचाए है जो अक्सर आपके मन में होते हैं।

अगर आपके पास कोई अन्य सुझाव और टिपण्णी हैं, तो कृपया हमसे जरूर साझा करें। हम आपके साथ हैं और आपके सारे सवालों के जवाब आप तक लाने की पूरी कोशिश करेंगे।

अधूरा गर्भपात (Incomplete Abortion) क्या है? अधूरे गर्भपात के प्रमुख लक्षण और उपचार क्या हैं ?

Synopsis: अधूरा गर्भपात क्या है ? अधूरे गर्भपात के लक्षण ( Symptoms of incomplete abortion), अधूरे गर्भपात के उपचार (Treatment of incomplete abortion) अधूरे गर्भपात के टेस्ट

अधूरा गर्भपात एक सामान्य मानसिक और शारीरिक रूप से कठिन प्रक्रिया है जिसमें गर्भ निकालने की पूरी प्रक्रिया समाप्त नहीं होती। अपूर्ण गर्भपात पहले 20 हफ्तों के भीतर गर्भधारण के उत्पादों का आंशिक नुकसान है। इसके लक्षण में खून की अधिक रिसाव, दर्द और मासिक धर्म के असामान्य बहाव शामिल होते हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए इसका शीघ्र निदान करना महत्वपूर्ण है कि रोगी गर्भधारण के सभी उत्पादों को बाहर निकाल दे। उपचार में डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं और किसी किसी स्थितियों में कुछ चिकित्सा प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। अधूरे गर्भपात के टेस्ट में सोनोग्राफी, परीक्षण और रक्त परीक्षण शामिल होते हैं।

अधूरा गर्भपात क्या हैं?

( What is incomplete abortion in hindi?)

गर्भपात के बाद जब भ्रूण के कुछ अंश गर्भाशय में रह जाते हैं, तो इस स्थिति को अपूर्ण गर्भपात या अधूरा गर्भपात कहा जाता है। अपूर्ण गर्भपात मध्यम से गंभीर योनि रक्तस्राव के साथ होता है, जो पेट के निचले हिस्से और/या पैल्विक दर्द से जुड़ा हो सकता है। अधूरा गर्भपात के मामले ज्यादातर स्वतंत्र गर्भपात (अनचाहा गर्भपात) के अंदर होते हैं, हालांकि एबॉर्शन पिल्स का उपयोग करना भी अधूरे गर्भपात का कारण बन सकता है।

अधूरे गर्भपात के ऐसे कई लक्षण है, जिन्हें नजर अंदाज़ नहीं किया जा सकता चलिए जानते हैं, अधूरे गर्भपात के लक्षणों के विषय में:-

अधूरे गर्भपात के लक्षण 

(Symptoms of incomplete abortion)

 

अक्सर, जब गर्भपात का इलाज किया जाता है, तो गर्भस्थान से बचा हुआ भाग कुछ समय तक अधूरा रह सकता है, लेकिन कई बार इसमें समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जिससे गर्भपात पूर्ण नहीं हो पाता है। हालांकि, ट्रीटमेंट के बाद भी कुछ समय बाद शरीर स्वतंत्र रूप से इसे पूर्ण कर सकता है।

अधूरे गर्भपात होने पर निम्नलिखित लक्षण आ सकते हैं…

  1. विशेष रूप से भारी रक्त स्राव
  2. रक्त की थक्के हो जाना
  3. पेट में दर्द और ऐठन
  4. लंबे समय तक बुखार
  5. रक्त स्राव का स्थाई रूप से बना रहना
  6. पीठ में दर्द और जकड़न
  1. गर्भावस्था के लक्षणों में कमी होना

गर्भपात के दौरान और उसके बाद खून बहना और क्रैपिंग होना सामान्य है, और सभी गर्भवतियां इस स्थिति में कई तरह के कष्टों का सामना करती हैं, लेकिन अपूर्ण गर्भपात के स्थिति में दिखने वाले लक्षण ऊपर बताए गए हैं।

अपूर्ण गर्भपात में, खून बहने और संक्रमण का खतरा होता है। इसलिए जितनी जल्दी हो सके इलाज करना उपयुक्त है।

आइए जानते हैं,अधूरे गर्भपात को रोकने के लिए किन उपचारों का सहारा लिया जा सकता है

अधूरे गर्भपात के उपचार

 

(Treatment of incomplete abortion)

गर्भपात अधूरा होने पर, उसके इलाज के लिए तीन विकल्प हो सकते हैं…

  1. इंतजार करन

    : प्राकृतिक रूप से गर्भाशय से गर्भवती उत्पन्नता को प्रकट होने का इंतजार करना

  2. मेडिसिन लेना (मेडिकल केयर के साथ)

    :औषधियों का सेवन करन

  3. सर्जरी से प्रेगनेंसी अवशेषों को बाहर निकालना

    शल्यचिकित्सा के माध्यम से गर्भाशय से अवशेषों को हटाना

हालांकि, यह आपकी स्थिति पर निर्भर करता है कि कौन सा मेथड आपके लिए उपयुक्त होगा। आपके डॉक्टर आपको सही मार्गदर्शन देंगे, लेकिन इससे पहले कुछ जाँचों को कराना भी आवश्यक है…

इन जाँचों के माध्यम से गर्भपात के कारण ” reason of miscarriage” को पहचाना जाता है (reason of miscarriage in hindi), गर्भपात के बाद एचसीजी का स्तर जाँचा जाता है (HCg level), और इसके बाद ही अपूर्ण गर्भपात का उपचार किया जाता है।

असफल गर्भपात में कुछ टेस्ट कराए जाने की आवश्यकता हो सकती है – गर्भपात अधूरा होने पर क्या करें?

यहाँ हम कुछ ऐसे टेस्ट के विषय में आपको जानकारी दे  रहे हैं, जिन्हे अधूरे गर्भपात क दौरान किया जाता हैं – जैसे कि

फीटल हार्ट स्कैनिंग

Fetal Heart Scanning

फीटल हार्ट स्कैनिंग, जिसे अंग्रेजी में “fetal heart scanning” कहा जाता है, एक प्रक्रिया है जिसमें गर्भावस्था के दौरान शिशु के हृदय की स्थिति का जाँच की जाती है। इसमें शिशु के हृदय की धड़कनों को स्कैन करके उसकी स्वस्थता और विकास का मूल्यांकन किया जाता है।

पेल्विस परीक्षण

– Pelvice exam

 

पेल्विस एग्जाम, जिसे हिंदी में “पेल्विक्स परीक्षण” कहा जाता है, एक चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें महिलाओं की प्रजनन नली और प्रजननांग क्षेत्र की जाँच की जाती है। इस परीक्षण में डॉक्टर महिला की गर्भाशय, बच्चेदानी, और आसपास के क्षेत्र की स्वस्थता का मूल्यांकन करने के लिए विभिन्न तकनीकों का उपयोग करते हैं।

अल्ट्रासाउंड

 

– Ultrasound test

अल्ट्रासाउंड, जिसे हिंदी में “अल्ट्रासाउंड परीक्षण” कहा जाता है, एक चिकित्सा परीक्षण है जिसमें श्रवण तरंगों का उपयोग करके शरीर के अंदर की छवियों को प्राप्त करने के लिए साधनों का उपयोग किया जाता है। यह परीक्षण विभिन्न रोगों की जाँच, गर्भावस्था के दौरान शिशु की स्थिति का मूल्यांकन, और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की जानकारी प्रदान करने में मदद करता है।

क्वांटीटेटिव एचसीजी ब्लड टेस्ट

(HCg test) – एचसीजी का स्तर गर्भपात 

 

एचसीजी टेस्ट, जिसे हिंदी में “एचसीजी परीक्षण” कहा जाता है, एक ब्लड टेस्ट है जो गर्भावस्था के दौरान बनने वाले होर्मोन एचसीजी (Human Chorionic Gonadotropin) का स्तर मापता है। यह टेस्ट गर्भपात की जाँच, गर्भावस्था की पुष्टि, और शिशु के स्वस्थ विकास का मूल्यांकन करने में मदद करता है।

गर्भपात के बाद पीरियड

 

(Period after abortion)

 

गर्भपात के बाद, मासिक धर्म का आरंभ होने में लगभग 1 महीने का समय लग सकता है। इस प्रक्रिया का समय कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि आपका अगला पीरियड कब आएगा…

  1. समय: आपका पीरियड 4 से 6 सप्ताह के बाद, गर्भपात के पश्चात शुरू हो सकता है। हालांकि, यह इस पर भी निर्भर करता है कि आपने गर्भधारण कितने समय तक किया था क्योंकि प्रेगनेंसी हार्मोन अभी भी आपके शरीर में हो सकते हैं।
  2. द्यूरेशन: गर्भपात के बाद, पहला पीरियड सामान्यत: छोटा हो सकता है, विशेषकर यदि आपने सर्जिकल अबॉर्शन करवाया हो तो, और यदि मेडिकल अबॉर्शन हुआ हो तो यह समय लेता है।

यदि 8 सप्ताह के बाद भी पीरियड शुरू नहीं होता है, तो प्रेगनेंसी टेस्ट कराएं और डॉक्टर से परामर्श करें।

अधूरे गर्भपात के उपचार

अधूरे गर्भपात का इलाज करने के लिए किन उपचारों को अपनाया जाता है? (Treatments for incomplete abortion in hindi)

विस्तार से जानें-

अधूरे गर्भपात का इलाज करने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग किया जा सकता है, जो सभी रूप से प्रभावी हो सकते हैं। यहां कुछ ऐसे तरीके हैं: जिन्हें आप अपना सकते हैं।

  1. इंतजार करना: अधूरे गर्भपात पूरा होने का समय नजर रखना, हालांकि यह थोड़ा अस्वाभाविक लग सकता है, लेकिन कुछ समय बाद गर्भपात स्वतंत्र रूप से पूरा हो सकता है।
  2. सर्जरी (D&C): अधूरे गर्भपात के कुछ मामलों में, सर्जिकल प्रक्रिया जिसे डिलीटेशन और क्यूरेटेज (D&C) कहा जाता है, की जा सकती है। यह तकनीक अत्यधिक रक्त स्राव की स्थिति में कारगर हो सकती है।
  3. ब्लड ट्रांसफ्यूजन: D&C के बाद, यदि ब्लीडिंग बनी रहे, तो ब्लड ट्रांसफ्यूजन का उपयोग किया जा सकता है।

ध्यान दें कि इन तकनीकों का उपयोग केवल चिकित्सक की सलाह पर ही किया जाना चाहिए, और प्रत्येक मामले का स्वभाव भिन्न हो सकता है।

D&C

आपने नाम तो कई बार सुना होगा पर अगर हम इसके बारे में डिटेल में बात करें तो,आपको बता दे कि अधूरे गर्भपात को रोकने  के लिए किया जाने वाला यह इलाज चिकित्सक या डॉक्टर के सजेशन पर किया जाता हैं परंतु इस इलाज के बाद कुछ ख़तरे भी हो सकते है जिन्हे आपको ध्यान में रखना चाहिए जैसे कि-

  1. सर्वाइकल डैमेज का खतरा: यहां सर्विक्स (गर्भाशय की गली) को नुकसान होने का खतरा हो सकता है।
  2. इंफेक्शन: सर्जरी के दौरान या बाद में इंफेक्शन का खतरा हो सकता है।
  3. ब्लीडिंग: रक्तस्राव का अधिक होने का खतरा हो सकता है।
  4. गर्भाशय में छेद: सर्जरी के दौरान गर्भाशय में छेद होने का खतरा हो सकता है।
  5. गर्भाशय में निशान पड़ना: सर्जरी के बाद गर्भाशय पर निशान पड़ने का खतरा हो सकता है।
  6. कॉम्प्लिकेशन ऑफ एनेस्थीसिया: बेहतरीन नहीं होने की स्थिति में एनेस्थेशिया से संबंधित समस्याएं हो सकती हैं।

हालांकि, डाइलेशन एंड क्यूरेटेज (Dilation & Curettage) एक सुरक्षित प्रक्रिया है, लेकिन जैसा कि किसी भी सर्जरी में होता है, इसमें भी कुछ रिस्क शामिल हो सकते हैं। D&C सर्जरी प्रक्रिया से पहले एनेस्थेसिया आपको दिया जाता है।

जिन महिलाओं को D&C सर्जरी के बाद भी ब्लीडिंग, डिस्चार्ज के साथ बदबू, और पेट में दर्द अथवा ऐठन होती है, उन्हें अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

चिकित्सा समाधान

असफल गर्भपात का मेडिकल उपचार – मीसोप्रोस्टल (साइटोटेक), जिसे child abortion में भी इस्तेमाल किया जाता है।

मीसोप्रोस्टल, मौखिक या योनि मार्ग में इस्तेमाल होता है, जिससे गर्भाशय में संकुचन होता है और प्रेगनेंसी अवशेष बाहर आ जाती है।

मीसोप्रोस्टल (साइटोटेक) को पहले अल्सर के इलाज में प्रयोग किया जाता था, लेकिन अब इसे अधूरे गर्भपात के इलाज में भी उपयोग किया जाता है।

मीसोप्रोस्टल (साइटोटेक) के साइड इफेक्ट्स:

  • पेट दर्द
  • चक्कर आना
  • उल्टियाँ
  • डायरिया

मिसकैरेज के संकेत

(Miscarriage Signs): महिलाओं में मिसकैरेज होने के 5 प्रमुख तरीके से हो सकते हैं।

 

महिलाओं में मिसकैरेज पाँच प्रमुख तरीकों से हो सकता है, जिन्हें निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया जा सकता है:

1.क्रिओप्रेसर्वेशन (क्रोमोसोमल विकृतियाँ): यह मिसकैरेज का सबसे सामान्य कारण है, जिसमें शिशु के गर्भनाल में क्रोमोसोम में विकृतियाँ होती हैं, जिससे गर्भपात हो सकता है।

2.एंटिबॉडी सिंड्रोम: इसमें महिला का शरीर उसके खिलाफ शिशु के खिलाफ अंतिबॉडी बना लेता है, जिससे गर्भपात हो सकता है।

3.योनि या गर्भाशय समस्याएँ: योनि या गर्भाशय में किसी भी प्रकार की समस्या भी मिसकैरेज का कारण बन सकती है।

4.हार्मोनल असंतुलन: महिला के शरीर में हार्मोनों का सही संतुलन नहीं होने से भी मिसकैरेज हो सकता है।

5.वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण: कई बार इन्फेक्शन भी गर्भाधान को प्रभावित कर सकते हैं और मिसकैरेज का कारण बन सकते हैं।

इन प्रमुख कारणों के अलावा भी कई अन्य कारण हो सकते हैं, और इनमें से कुछ बार एक से अधिक कारण एक साथ मिल सकते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि मिसकैरेज के संबंधित समस्याओं का सही तरीके से निदान और उपचार हो, जिसके लिए चिकित्सक से सही सलाह और जांच करवाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अगर गर्भपात अधूरा हो जाए, तो निम्नलिखित कदम उठाएं

गर्भपात के बाद, आपको अपने आत्म-स्वास्थ्य की देखभाल का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस संघर्षपूर्ण समय में, यहां कुछ केयर टिप्स हैं जो आपको इससे उभरने में सहायक हो सकती हैं।

  1. आत्म-प्रेम और ध्यान: आपको अपने आत्म-प्रेम का ख्याल रखना महत्वपूर्ण है। आपको अपनी भावनाओं को साझा करने के लिए समय देना चाहिए और अपने मानसिक स्वास्थ्य के लिए मेडिटेशन करना चाहिए।
  2. पोषणपूर्ण आहार: गर्भपात के बाद, आपको पोषणपूर्ण आहार लेना चाहिए क्यों कि आपके शरीर को आवश्यक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है जो शीघ्र पुनर्निर्माण में मदद कर सकती हैं।
  3. सहानुभूति और समर्थन: इस समय में, आपको परिवार और दोस्तों से सहानुभूति और समर्थन की आवश्यकता होती है। उन्हें आपकी भावनाओं का समझना और शेयर करना महत्वपूर्ण है।
  4. साकारात्मक गतिविधियाँ: सकारात्मक गतिविधियों में शामिल होना आपको मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है। योग, मेडिटेशन, या कोई भी आपको प्रिय गतिविधि में आपको समय बिताना चाहिए।
  5. चिकित्सक से परामर्श: आपको इस समय में अपने चिकित्सक से मार्गदर्शन लेना चाहिए। वे आपको शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की सही देखभाल और सलाह प्रदान कर सकते हैं।

इस कठिन समय में, आपको अपनों का सहारा और समर्थन लेना चाहिए जिससे आपका आत्मीय दुःख ,परेशानियाँ कम हो सके और अपनी शक्ति को पुनः प्राप्त कर सके।

तो यह थीं ,अधूरे गर्भपात (Incomplete Abortion)से जुड़ी ऐसी महत्वपूर्ण बातें जो आपको पता होनी चाहिए, हम पेरेंटिंग से संबंधित इसी प्रकार की और जानकारियाँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। अगर आपके पास कोई अन्य सुझाव और टिपण्णी हैं तो कृपया हमसे जरूर साझा करें। हम आपके साथ हैं और आपके सारे सवालों के जवाब आप तक लाने की पूरी कोशिश करेंगे।

Reference links
https://www.hindiram.com/apurn-garbhpaat-ke-lakshan-or-upchar.html
https://www.thehealthsite.com/hindi/pregnancy/there-are-5-types-of-miscarriage-in-women-know-their-symptoms-in-hindi-834000

फोलिक एसिड क्या होता है? सामान्य गर्भावस्था और मल्टिपल प्रेग्नेंसी के लिए क्यों है जरूरी?

Synopsis: फोलिक एसिड क्या होता है? (Folic acid in hindi) फोलिक एसिड सामान्य गर्भावस्था और मल्टिपल प्रेग्नेंसी के लिए क्यों है जरूरी? फोलिक एसिड के उपयोग (folic acid uses in hindi), फोलिक एसिड की कमी से नुकसान

फोलिक एसिड एक विटामिन-बी है, जो बी-कॉम्प्लेक्स से संबंधित है, और यह गर्भावस्था के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह शिशु के न्यूरल ट्यूब विकसित करने में मदद करता है, जो शिशु के न्यूर्वस सिस्टम का निर्माण करता है।

सामान्य गर्भावस्था और मल्टिपल प्रेग्नेंसी दोनों लिए जरूरी होता है क्योंकि मल्टिपल प्रेग्नेंसी के दौरान, फोलिक एसिड की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है क्योंकि शिशुओं की संख्या बढ़ जाती है और इससे गर्भावस्था में और ज्यादा पोषण की आवश्यकता होती है।आमतौर पर, एक गर्भवती महिला को प्रतिदिन कम से कम ४०० माइक्रोग्राम (mcg) फोलिक एसिड लेना चाहिए, लेकिन डॉक्टर की सलाह के आधार पर इस मात्रा को बढ़ाया जा सकता है।

मल्टिपल प्रेग्नेंसी  के दौरान, डॉक्टर आमतौर पर और अधिक फोलिक एसिड की सलाह देते हैं ताकि हर शिशु का न्यूरल ट्यूब सही रूप से विकसित हो सके और गर्भवती महिला और शिशु की स्वास्थ्य को सही तरीके से समर्थित किया जा सके।

एक गर्भवती महिला के लिए फोलिक एसिड लेने का सही समय क्या है?
(The right time for a pregnant woman to take Folic acid)

गर्भवती महिला को फोलिक एसिड को आमतौर पर प्रे-प्रेगनेंसी (pregnancy के शुरुआती दिनों से) लेना शुरू कर देना चाहिए। फोलिक एसिड गर्भवती महिलाओं के लिए बहुत अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर पहले तीन महीने (पहले ट्राइमेस्टर) के दौरान, जब शिशु के न्यूरल ट्यूब का विकास होता है।

फोलिक एसिड की सामान्य अधिकता दिन में 400 माइक्रोग्राम होती है,डॉक्टर आमतौर पर गर्भवती होने की योजना बनाते समय फोलिक एसिड की सही मात्रा और समय का सुझाव देते हैं, ताकि शिशु का न्यूरल ट्यूब सही रूप से विकसित हो सके और गर्भवती महिला और शिशु की स्वास्थ्य को सही तरीके से समर्थित किया जा सके।

सामान्यत: फोलिक एसिड का सेवन गर्भवती होने से पहले तीन महीने तक जारी रखा जाता है, लेकिन डॉक्टर की सलाह पर यह समय और मात्रा में बदल सकता है।

कौन सा फोलिक एसिड गर्भावस्था के लिए सर्वोत्तम माना जाता है?
(Which Folic acid is considered best for pregnancy?)

 गर्भावस्था के लिए, सर्वोत्तम फोलिक एसिड सामान्यत: 400 माइक्रोग्राम (mcg) से 800 माइक्रोग्राम (mcg) तक की दिन में एक मात्रा है। यह मात्रा गर्भवती होने से पहले और गर्भवती होने के पहले तीन महीने तक को सुनिश्चित करने के लिए सामान्यत: सुझाई जाती है।फोलिक एसिड की सही मात्रा और समय का निर्धारण करने के लिए, डॉक्टर की सलाह और गाइडेंस पर भरोसा करना महत्वपूर्ण है।

फोलिक एसिड का सही स्तर रखना गर्भवती महिला और शिशु के न्यूरल ट्यूब विकास को सहारा कर सकता है और न्यूरोलॉजिकल प्रोब्लम्स की संभावना को कम कर सकता है।

फोलिक एसिड किनकिन चीजों में पाया जाता है ?
(Sources of Folic acid)

फोलिक एसिड प्राकृतिक रूप से कई आहारों में पाया जाता है, और यह विभिन्न खाद्य पदार्थों में मौजूद होता है। यहां कुछ ऐसी चीजें हैं जो फोलिक एसिड को सामग्री में शामिल कर सकती हैं:

  1. पत्तियाँ और हरा सब्जियाँ: सब्जियों में फोलिक एसिड आमतौर पर पाया जाता है, विशेषकर शाकाहारी आहार में। सब्जियों में पालक, सरसों के पत्ते, शलरी, मेथी, और ब्रोकोली जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं।
  2. फल: फलों में भी फोलिक एसिड होता है, जैसे कि अवोकाडो, नारंगी, मौसमी, आम, बनाना, और स्ट्रॉबेरी।
  3. अनाज और धान्य: अनाज और धान्य के उत्पादों में भी फोलिक एसिड पाया जा सकता है, जैसे कि गेहूं, चावल, और बाजरा।
  4. अंडे: अंडे भी फोलिक एसिड का एक स्रोत हो सकते हैं।
  5. दूध और दैहिक उत्पाद: दूध, दही, और पनीर जैसे दैहिक उत्पादों में भी फोलिक एसिड मिल सकता है।

गर्भवती महिलाओं को फोलिक एसिड से भरपूर आहार लेना चाहिए, ताकि शिशु का सही विकास हो सके और न्यूरल ट्यूब डिफ़ेक्ट्स की संभावना को कम किया जा सके।

फोलिक एसिड के क्या फायदे हैं?
(Benefits of Folic acid)

फोलिक एसिड के कई लाभ होते हैं, जो गर्भवती महिलाओं और शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। यहां कुछ मुख्य लाभ हैं:

  1. न्यूरल ट्यूब डिफ़ेक्ट्स की सुरक्षा: गर्भवती महिलाओं को फोलिक एसिड लेने से न्यूरल ट्यूब डिफ़ेक्ट्स की संभावना कम होती है, जो शिशु के न्यूरल ट्यूब के विकास में हो सकते हैं।
  2. शिशु का सही विकास: फोलिक एसिड शिशु के न्यूरल ट्यूब, ब्रेन, और स्पाइन के सही विकास में मदद करता है।
  3. डीएनए निर्माण:यह शिशु केडीएनए का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  4. रक्त कणिकाओं का निर्माण: फोलिक एसिड लाल रक्त कणिकाओं का निर्माण करने में मदद कर सकता है, जो अच्छे रक्त प्रवाह के लिए आवश्यक हैं।
  5. दिल के स्वास्थ्य का समर्थन: फोलिक एसिड हृदय के स्वास्थ्य को सुधारने में मदद कर सकता है और हृदय संबंधी बीमारियों की संभावना को कम कर सकता है।

इन लाभों के कारण, गर्भवती महिलाओं को अपने डॉक्टर की सलाह पर चलकर फोलिक एसिड सप्लीमेंट्स लेना चाहिए।

फोलिक एसिड की कमी से होने वाली हानियां क्या हैं?
(Disadvantages of Folic acid Deficiency)

 फोलिक एसिड की कमी से होने वाली हानियां निम्नलिखित हो सकती हैं:

  1. न्यूरल ट्यूब डिफ़ेक्ट्स: फोलिक एसिड की कमी गर्भवती महिलाओं में न्यूरल ट्यूब डिफ़ेक्ट्स की संभावना बढ़ा सकती है, जो शिशु के न्यूरल ट्यूब और स्पाइन के निर्माण में दोष कर सकती है।
  2. मेगलोब्लास्टिक एनीमिया: फोलिक एसिड की कमी से मेगलोब्लास्टिक एनीमिया हो सकती है, जिसमें रक्त में बड़े और असमान प्रकार के रक्तकणिकाएँ बनती हैं, जो सामान्य रक्तकणिकाओं की तुलना में अधिक असमर्थ होती हैं।
  3. प्रजनन संबंधित समस्याएं: फोलिक एसिड की कमी से प्रजनन संबंधित समस्याएं भी हो सकती हैं, जैसे कि बार-बार गर्भपात या प्रजनन में कठिनाएँ।
  4. वृष्टि समस्याएं (Rain problem):फोलिक एसिड की कमी से शरीर की वृष्टि समस्याएं हो सकती हैं, जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है।
  5. दिल संबंधित समस्याएं: फोलिक एसिड की कमी से दिल संबंधित समस्याएं बढ़ सकती हैं, जैसे कि हृदय संबंधित रोगों की संभावना।

फोलिक एसिड की सही मात्रा में सेवन करना गर्भवती महिलाओं और सामान्य जनता के लिए स्वस्थ रहने में मदद कर सकता है, इसलिए इसे विशेषकर गर्भवती महिलाओं को ध्यानपूर्वक लेना चाहिए।

फोलिक एसिड  की दवा लेने से मुझे क्या दुष्प्रभाव दिख सकते हैं?
(Side effects of Folic acid)

निम्नलिखित दुष्प्रभावों को तुरंत देखभाल टीम को सूचित करें:

  1. एलर्जी प्रतिक्रियाएं – त्वचा पर लाल चकत्ते, खुजली, पित्ती, चेहरे, होंठ, जीभ या गले की सूजन।
  2. साँस की परेशानी।
  3. हाथ या पैर में दर्द, झुनझुनी या सुन्नता।
  4. साइड इफेक्ट्स – जैसे कि स्वाद में बदलाव, गैस, सामान्य बेचैनी और थकान, भूख में कमी, जी मिचलाना।

सामान्य दुष्प्रभावों के लिए आमतौर पर चिकित्सा की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन अगर ये दुष्प्रभाव बने रहते हैं या परेशानी का कारण बनते हैं, तो कृपया अपनी देखभाल टीम को सूचित करें:

  1. स्वाद में बदलाव
  2. गैस की समस्या
  3. सामान्य बेचैनी और थकान
  4. भूख में कमी
  5. जी मिचलाना

ध्यान दें: यह सूची सभी दुष्प्रभावों का संख्यात्मक विवरण नहीं है। डॉक्टर से चिकित्सात्मक सलाह के लिए कृपया संपर्क करें।

आशा है, अब आपने फोलिक एसिड से जुड़ी सभी जानकारियों को हासिल कर लिया होगा।  अगर आपको हमारा यह आर्टिकल पसंद आया हो तो अपने विचार हमारे साथ जरूर से साझा करें साथ ही किसी और विषय के बारे में जानने की रुचि रखते हैं तो उसे कमेंट बॉक्स में लिखें।

मल्टीपल प्रेग्नेंसी क्या है? मल्टिपल प्रेग्नेंसी, सामान्य प्रेग्नेंसी से क्यों है, अलग?

Synopsis: मल्टीपल प्रेग्नेंसी (एकाधिक गर्भावस्था) क्या है? मल्टिपल प्रेग्नेंसी, सामान्य प्रेग्नेंसी से अलग क्यों है? Multiple pregnancy से जुड़ी सारी important बातें विस्तार से

मल्टीपल प्रेग्नेंसी (एकाधिक गर्भावस्था) क्या है? (What Is Multiple Pregnancy?)

“मल्टीपल प्रेग्नेंसी” का मतलब होता है, कि एक से अधिक बच्चे के साथ गर्भवती होना | इस स्थिति में अक्सर एक से अधिक अंडाणु गर्भाशय में मिलते हैं। यह भी हो सकता है कि एक अंडा जुड़ता है और फिर उससे दो या दो से अधिक भ्रूण बनते हैं, जो दो या दो से अधिक बच्चों में विकसित हो जाते हैं।

अगर अलग शब्दों में कहा जाए तो,एक से अधिक शिशुओं की गर्भवती महिला को “बहुभाग्य” या “मल्टीपल प्रेगनेंसी” के नाम से जाना जाता है जिसके विभिन्न कारण हो सकते हैं जैसे कि जीनेटिक लक्षण, आयु, या चिकित्सा प्रक्रियाएं। इस प्रकार की गर्भवती में महिला को एक से अधिक शिशुओं की देखभाल की जरूरत होती है जो सावधानीपूर्वक की जानी चाहिए।

सामान्य प्रेग्नेंसी से क्यों अलग है मल्टिपल प्रेग्नेंसी? (Why is multiple pregnancy different from normal pregnancy?)

गर्भ में तीन या तीन से अधिक बेबी होने पर इसे हाइयर ऑर्डर प्रेग्नेंसी या मल्टीपल प्रेग्नेंसी कहा जाता है। 50 महिलाओं में से 1 या 2 महिला को मल्टिपल प्रेग्नेंसी हो सकती है। जिसके कारण, इसमें और अधिक सुरक्षा और चिकित्सा की जरूरत होती है, और इसे विशेष ध्यान से निगरानी में रखना होता है।

आईए जानते हैं… मल्टीपल प्रेगनेंसी से जुड़ी कुछ और महत्वपूर्ण बातें:-

Table of Content

  • मल्टीपल प्रेग्नेंसी (एकाधिक गर्भावस्था) क्या है? (What Is Multiple Pregnancy?)
  • सामान्य प्रेग्नेंसी से क्यों अलग है मल्टिपल प्रेग्नेंसी? (Why is multiple pregnancy different from normal pregnancy?)
  • मल्टिपल प्रेग्नेंसी (Multiple Pregnancies) क्यों और कैसे होती है?
  • मल्टीप्ल प्रेगनेंसी में एक से अधिक बार गर्भवती होने का कारण क्या होता है?( What is the reason for getting pregnant more than once in multiple pregnancy?)
  • मल्टिपल प्रेग्नेंसी के लक्षण क्या हैं? (Symptoms of Multiple Pregnancies)
  • जुड़वा बच्चों के साथ गर्भवती ?( Pregnant with twins)
  • मल्टीप्ल प्रग्नेंसी के दौरान सुरक्षा उपाय और सावधानियाँ (Safety measures and precautions during multiple pregnancy)
  • मल्टिपल प्रेग्नेंसी का निदान कैसे किया जाता है? (Diagnosis of Multiple Pregnancies)
  • मल्टिपल प्रेग्नेंसी के दौरन किये जाने वाले प्रमुख टेस्ट (Major tests done during multiple pregnancy)
  • मल्टीपल प्रेगनेंसी क दौरान क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? (What to do and what not to do during multiple pregnancy?)
  • मल्टिपल प्रेग्नेंसी होने पर डिलिवरी किन तरीको से की जा सकती है?( In what ways can delivery be done in case of multiple pregnancy?)
  • अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

मल्टिपल प्रेग्नेंसी (Multiple Pregnancies) क्यों और कैसे होती है?

आधुनिक जीवनशैली के साथ जुड़े कुछ कारणों से, जैसे उच्च तंतुमाध्यम आय (high fiber income), तेजी से बदलते भोजन हैबिट्स और ज्यादा देर एक ही जगह बैठे रहना ,शरीर के बारे मैं ज्यादा न सोचना, ओवुलेशन के लिए अत्यधिक मात्रा में दवाइयों का सेवन करना मल्टीप्ल प्रेगनेंसी के होने का संकेत है |

एक से अधिक बार गर्भवती होने के कई कारण हो सकते हैं। यह स्थिति “मल्टीप्ल प्रेग्नेंसी” के रूप में जानी जाती है, जिसमें महिला एक से अधिक शिशुओं के साथ गर्भधारण करती है।

मल्टीप्ल प्रेगनेंसी होने के प्रमुख कारण क्या है?( What is the main reason of multiple pregnancy?)

 इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं-

  • उम्र (Age)- अधिक उम्र की महिलाओ में मल्टिपल प्रेग्नेंसी की संभावना देखने को मिलती है, जिनकी उम्र 35 वर्ष या फिर इससे अधिक की होती है |
  • अनुवांशिक (Genetics)- आपके लिए यह जानना भी जरूरी है, कि अलग-अलग अंडों से उत्पन्न होने वाले बच्चों को फ्रेटरनल कहा जाता है। ऐसा तब होता है, जब दो या इससे अधिक अंडों को स्पर्म ने गर्भाधान किया है। यदि महिला के परिवार में पहले से ही फ्रेटरनल ट्विन्स (Twins) हैं, तो इसकी संभावना बढ़ जाती है। अधिकांश ट्विन्स इसी तरह के होते हैं, जिन्हें एक जैसे दिखा जा सकता है या वे अलग-अलग भी हो सकते हैं।
  • परिवारिक इतिहास(Family history): यदि महिला के परिवार में पहले से ही मल्टिपल प्रेग्नेंसी की संभावना हो, तो इससे उत्तेजना बढ़ सकती है।

इन प्रमुख कारणो के अलावा,मल्टिपल प्रेग्नेंसी (Multiple Pregnancies) के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।

जैसे

  1. विभिन्न रोग और स्वास्थ्य स्थितियाँ (Various diseases and health conditions): कुछ रोग और स्वास्थ्य स्थितियाँ भी मल्टिपल प्रेग्नेंसी को बढ़ा सकते हैं, जैसे कि पोलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (PCOS) और हाइपरटेंशन (high blood pressure)।
  2. प्रजनन सहायता तकनीकें(Reproductive assistance technologies): आधुनिक प्रजनन सहायता तकनीकों का उपयोग करने पर भी मल्टिपल प्रेग्नेंसी की संभावना बढ़ सकती है, जैसे कि इनविट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) या आर्टिफिशियल इंसीमिनेशन।

                     इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) की प्रक्रिया में, मैच्योर एग्स को ओवेरी से बाहर निकालकर प्रयोगशाला में रखा जाता है। इसके बाद इन्हें स्पर्म के साथ फर्टिलाइज किया जाता है।

  1. गर्भावस्था की सही देखभाल(Proper pregnancy care): एक बार प्रेग्नेंट होने पर सही देखभाल नहीं होने पर भी मल्टिपल प्रेग्नेंसी की संभावना बढ़ सकती है।
  2. अंडाणु और ओवुलेशन की समस्याएं(Problems with eggs and ovulation): अंडाणु और ओवुलेशन से संबंधित समस्याएं भी मल्टिपल प्रेग्नेंसी का कारण बन सकती हैं।

मल्टिपल प्रेग्नेंसी के लक्षण क्या हैं? (Symptoms of Multiple Pregnancies in hindi)

 

मल्टिपल प्रेग्नेंसी के निम्नलिखित लक्षण होते हैं-जिसमें आमतौर पर जुड़वा बच्चों के साथ गर्भवती होना प्रमुख लक्षण देखा गया है आईए जानते हैं इससे जुड़े प्रमुख लक्षणों के विषय में –

जुड़वा बच्चों के साथ गर्भवती?( Pregnant with twins?)

 इसे ध्यान में रखिए

मॉर्निंग सिकनेस (Morning sickness)- मल्टीप्ल प्रेगनेंसी के प्रमुख लक्षणों में मॉर्निंग सिकनेस का होना एक आम बात है, जो की सामान्य गर्भावस्था के दौरान भी देखने को पाई जाती है, परंतु यह नॉर्मल मॉर्निंग सिकनेस से इसलिए अलग है क्योंकि इसमें जरूरत से ज्यादा जी मिचलाना, पूरे समय उल्टी या मतली की अनुभूति का होना ,स्तनों का बहुत अधिक सॉफ्ट हो जाना प्रमुख है।

प्राय: गर्भवती होने के तीन महीने के दौरान ज्यादातर होती है, लेकिन कुछ महिलाओं को इसे गर्भावस्था के पूरे कालांतर में अनुभव हो सकता है।

भूख ज्यादा लगना(Feeling more hungry)- गर्भावस्था के दौरान भूख का लगना आम बात है परंतु मल्टीप्ल प्रेगनेंसी के अंतर्गत अगर आपको भूख ज्यादा लगती है तो डरने वाली कोई बात नहीं है क्योंकि एक से अधिक बच्चों के गर्भ में विकसित होने के लिए उन्हें अच्छे एवं हेल्दी मात्रा के आहार की जरूरत होती है जो कि आप उन्हें बार-बार खाकर ही अपने बच्चों तक पहुंचा सकते हैं जिससे उनका शरीर परिपक्व हो सके।

वजन बढ़ना (Weight gain)- गर्भ में सामान्यतः बच्चे का वजन 10 से 16 किलो तक का होना नॉर्मल बच्चे के होने के संकेत है ,पर लेकिन इससे अधिक वजन होने पर यह मल्टीपल प्रेगनेंसी जैसे एक या एक से अधिक बच्चे होने की संभावना को बढ़ा देता है, दूसरे ट्रिमेस्टर में बड़े हुए वजन के जरिए इसे आसानी से समझा जा सकता है।

गर्भ का आकार बढ़ना (Baby womb size)- मल्टीप्ल प्रेगनेंसी के अंतर्गत गर्भ का आकार ,एक नॉर्मल गर्भ के आकार से थोड़ा बड़ा होता है क्योंकि इसमें दो या तीन या फिर अधिक बच्चों का विकसित होना तय है, जिसकी वजह से गर्भ का आकार भी बड़ा दिखाई पड़ता है, सामान्य बोलचाल की भाषा में समझना चाहे तो बेबी बंप बड़ा होता है|

इन संकेतों (लक्षणों) के अतिरिक्त, अन्य लक्षण भी उत्पन्न हो सकते हैं, क्योंकि प्रत्येक गर्भवती महिला का शारीरिक संरचना अद्वितीय (अलग) होती है। यह जुड़वा बच्चों के साथ गर्भवती होने के कुछ महत्वपूर्ण लक्षण होते हैं|

ऊपर दी गई जानकारी में अब तक आपने जाना मल्टीप्ल प्रेगनेंसी के दौरान या फिर कह लीजिए जुड़वा बच्चों के साथ गर्भवती होने पर किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए|

अब जान लेते हैं…..

शुरूआती महिनो में गर्भपात के लक्षण, कारण और उपचार

Synopsis : जानें गर्भपात के कारण, गर्भपात के संकेत और लक्षण, गर्भपात के निदान, गर्भपात के प्रकार, गर्भपात को रोकने के प्राकृतिक तरीके

गर्भपात ( मिसकैरेज ) क्या है? क्यों होता है? जानिए इसके कारण, लक्षण, बचाव और भी बहुत कुछ विस्तार से

माँ, एक ऐसा शब्द है जिसमें समय के साथ कई भावनात्मक और रचनात्मक रहस्य छुपे होते हैं। माँ बनना, किसी भी महिला के जीवन का सबसे सुखद और भावनात्मक क्षण होता है। जब कोई महिला पहली बार यह जानती है कि वह माँ बनने वाली है, तो उसकी आत्मा में नए सपने और उत्साह का समंदर उतर आता है।

लेकिन अचानक, जब उसे यह पता चलता है कि जिस छोटे से जीवन के लिए वह सभी सपने बुन रही है, वह अब इस दुनिया में आने के पहले ही उससे दूर हो गया है, याने की उसका गर्भपात (मिसकैरेज) हो गया है, तो उस माँ के लिए यह दर्द और पीड़ा को सहना और भी अधिक कठिन हो जाता है।

अगर आप माँ बनने के लिए तैयारी में हैं, तो इस लेख में हम आपको गर्भपात (मिसकैरेज) से संबंधित सभी पहलुओं को विस्तार से बताएंगे।

विषय सूची (Table of content)

  1. गर्भपात ( मिसकैरेज ) का अर्थ क्या है?( What is the meaning of miscarriage?)
  2. मि गर्भपात ( मिसकैरेज ) क्यों होता हैं?(Why does miscarriage happen?)
  3. गर्भपात ( मिसकैरेज ) के कारण – Causes of miscarriage in Hindi
  4. गर्भपात से बचने के लिए सावधानियां (Precautions From Miscarriage)
  5. गर्भपात ( मिसकैरेज ) के लक्षण– symptoms of a miscarriage in Hindi
  6. गर्भपात से बचने के लिए क्या करना चाहिए?(What should be done to avoid miscarriage?)
  7. गर्भपात के बाद सही होने में कितना समय लगता है?( Recovering from a miscarriage in Hindi)
  8. गर्भपात या मिसकैरेज के बाद पीरियड पीरियड क्यों आता हैं?
  9. मिसकैरेज के बाद दोबारा प्रेगनेंट होने के लिए क्या करें ?(what to do for Getting pregnant again in Hindi)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल- FAQs

गर्भपात (मिसकैरेज) का अर्थ क्या है? (What is the meaning of miscarriage?)

गर्भावस्था का अर्थ होता है गर्भ में पल रहे भ्रूण (बच्चे) का स्वत: नष्ट हो जाना, सामान्य भाषा में समझे तो गर्भावस्था के 20 वे सप्ताह से पहले ही गर्भ का गिर जाना एबॉर्शन/मिस्कैरेज/गर्भपात कहलाता हैं। इसलिए आमतौर पर गर्भावस्था के पहले तीन महीने (First Trimester ) बड़े ही संभलकर चलने को होते हैं क्यों की मिस्कैरेज शुरूआत के पहले तीन महीनों के दौरान ही होती है।

गर्भपात (मिसकैरेज) क्यों होता हैं? (Why does miscarriage happen?)

सामान्यत: गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में मिसकैरेज होता है क्यों की यही वो टाइम पीरियड होता है जिसमे भ्रूण परिपक़्व होना शुरू करता है पर कई बार ऐसी स्थिति भी हो जाती है की भ्रूण को जो पोषण मिलना चहिए वह उस तक नहीं पहोच पता और उसका विकास रुक सा जाता है और जांच के दौरान पता चलता है की आपके बच्चे का विकास रुक गया है और अब वह विकसित नहीं हो सकता जितना उसे पहले चरण के दौरान हो जाना चाहिए था, यही अवस्था “मिसकैरेज” (गर्भपात )कहलाती हैं। इसलिए कई बार आवश्यकता होती है तकनीकी जाँच और चिकित्सा सलाह ली जाए।

गर्भपात (मिसकैरेज) के कारण (Causes of miscarriage in Hindi)

मिसकैरेज होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। लेकिन ,तीन महीने के बाद या 14 से 26 सप्ताह के बीच होने वाले गर्भपात की वजह आमतौर पर गर्भवती माँ के स्वास्थ्य स्थिति (health condition) होती है ।

गर्भपात (मिसकैरेज) का कारण क्या होता है, इसे समझने के लिए ये 5 मुख्य कारण जानें और सावधानी बरतें

मिसकैरेज होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं।

जैसे-

  1. गर्भावस्था के शुरुआती चरण में:

    मिसकैरेज सामान्यत: गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में होता है, जब गर्भधारण की प्रक्रिया शुरू होती है।

  2. अनियमित गर्भधारण या भ्रूण विकसन में असमान्यता

    कई बार गर्भावस्था के दौरान भ्रूण का सही रूप से विकसन नहीं हो पाता और इसके कारण मिसकैरेज हो सकता है।

  3. रगड़ाई या अनुवांछित गर्भाशय की स्थिति

    मातृगर्भ का सही स्थान पर स्थानांतरित नहीं होने पर या रगड़ाई होने पर मिसकैरेज हो सकता है।

  4. मातृ रोग या आत्मिक तनाव

    महिला के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य में किसी भी समस्या के कारण मिसकैरेज हो सकता है, जैसे कि बीमारियाँ या आत्मिक तनाव।

  5. इंफेक्शन या बीमारीयों का प्रभाव

    गर्भावस्था के दौरान होने वाली इंफेक्शन्स या बीमारियाँ भी मिसकैरेज का कारण बन सकती हैं।

जब कोई महिला गर्भवती होती है, तो यह खुशी पूरे परिवार को स्पर्श करती है। खासकर वे माता-पिता जो अपने आने वाले शिशु से पहले ही भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं। गर्भावस्था के दौरान, महिला जो भी महसूस करती है, उसे अपने पति को बताना अच्छा लगता है। इस प्रकार, वे दोनों मिलकर इस अद्भुत समय का आनंद लेते हैं और बच्चे के आगमन की आशा से प्रतीक्षा करते हैं।

लेकिन यदि इस दौरान कोई अनैतिकता हो जाए और महिला गर्भपात हो जाए, तो यह स्थिति मानसिक रूप से विकराल होती है। इससे केवल महिला ही नहीं, बल्कि उसके पति को भी प्रभावित होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, मिसकैरेज की निश्चित वजहों को तार्किक रूप से बताना मुश्किल है, लेकिन कुछ विशेष चिकित्सा स्थितियाँ महिला को सतर्क रहने के लिए आगाह कर सकती हैं। ये चिकित्सा स्थितियाँ मिसकैरेज के कारण बन सकती हैं।

गर्भपात से बचने के लिए सावधानियां (Precautions From Miscarriage)

अगर आप माँ बनने जा रही है या बेबी प्लान करने का मन बना रही है तो आपको इन सावधानियों को ध्यान में जरूर रखना चाहिए।

गर्भपात से बचने के लिए निम्नलिखित सावधानियां बरतना चाहिए।

गर्भावस्था मे थायरॉयड

आजकल थायरॉयड समस्या बहुत ही सामान्य हो गई है, और इस समस्या से सबसे ज्यादा प्रभावित महिलाएं हैं। आमतौर पर, महिलाएं इस समस्या को सामान्य मान लेती हैं, लेकिन गर्भावस्था के दौरान थायरॉयड समस्या होने पर आपको सतर्क रहने की आवश्यकता है, क्योंकि यह एक हार्मोन संबंधित समस्या है। थायरॉयड के साथ हुई प्रेगनेंसी में आपको डॉक्टर की निगरानी में रहना बहुत जरूरी है, क्योंकि इससे कई बार गर्भपात की समस्या उत्पन्न हो सकती है।

गर्भावस्था मे हार्मोनल असंतुन

यदि हिला को पहले से ही कोई हार्मोनल समस्या हो, या उसका शरीर यूट्रस की लाइनिंग को सपोर्ट करने के लिए आवश्यक प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन नहीं बना पा रहा है, तो ऐसी स्थिति में मिसकैरेज के खतरे बढ़ जाते हैं। यदि समय रहते इस समस्या को समझा जाए, तो दवाओं के माध्यम से इस स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।

गर्भावस्था मे क्रोमोसोमल असामान्यता

क्रोमोसोमल असामान्यता, जिसे कई बार क्रोमोसोम विकृति भी कहा जाता है, फर्टिलाइजेशन के प्रक्रिया के दौरान, स्पर्म और एग एक पूर्ण मैच बनाने के लिए 23 क्रोमोसोमों को मिलाते हैं। यह एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें थोड़ी सी गड़बड़ी भी क्रोमोसोमल विकृति का कारण बन सकती है और इसके कारण मिसकैरेज हो सकता है।

गर्भावस्था मे फाइब्रायड्स

फाइब्रॉयड और मिसकैरेज दोनों ही महिलाओं के गर्भावस्था से संबंधित हो सकते हैं, लेकिन ये दोनों अलग-अलग स्थितियाँ हैं।

फाइब्रॉएड एक प्रकार की ग्रंथि होती है जो महिला के गर्भाशय में होती हैं जिसकी असमान्य वृद्धि बड़े-बड़े फाइब्रायड्स में बदल जाती है जो गैर-कैंसरीय होती हैं, डरने की बात नहीं है डॉक्टर्स के पास ऐसे कई इलाज है जिससे इनकी वृद्धि को रोका जा सकता है वैसे तो फाइब्रायड्स हर महिला के गर्भाशय में होते है पर किसी को इसका पता चल पता है और किसी को नहीं आपको बता दे यह बच्चे के जन्म के दौरान गर्भाशय को सहारा देने क लिए ज़रूरी होते हैं पर सीमित आकर वाले फाइब्रायड्स।

यदि फाइब्रॉयड्स बड़े होते हैं या वे गर्भाशय की अंदरूनी सतह पर स्थित होते हैं, तो ये गर्भावस्था को प्रभावित कर सकते हैं और किसी महिला को मिसकैरेज के खतरे का सामना करना पड़ सकता है।

इस प्रकार, फाइब्रॉयड्स गर्भावस्था को प्रभावित कर सकते हैं और किसी महिला को मिसकैरेज की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन ये दोनों स्थितियां अलग-अलग हैं और हर स्थिति के लिए उपयुक्त उपचार की आवश्यकता होती है

गर्भपात (मिसकैरेज) के लक्षण– (Symptoms of a miscarriage in Hindi)

किसी भी महिला के लिए गर्भवती होना एक सौभाग्य की बात होती हैं अगर उसका गर्भवती टाइम पीरियड अच्छा चल रहा हो और अचानक से उसे ये पता लग जाये की उसका गर्भपात हो चुका है तो उसके ऊपर दुखो: का मनो जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो कभी-कभी, कुछ घटनाएं इतनी अचानक और अज्ञात हो जाती हैं कि इंसान खुद को समझ पाने में विफल हो जाता है। ऐसे कुछ मामलों में, जिनमें मिसकैरेज (गर्भपात) होता है, यह सब इतनी जल्दी होता है कि व्यक्ति को अकेले में ही समझ में नहीं आता कि उनका गर्भवती होने का सपना भी था, और फिर एक दिन वह गर्भपात का सामना कर रहे होते हैं।

चलिए, हम मिसकैरेज के प्रमुख लक्षणों के बारे में जानते हैं।

1.

पेट में दर्द (Stomach ache)

के समय, महिला को पेट में दर्द का अहसास हो सकता है, जो कभी-कभी तेज भी हो सकता है।

2.

रक्तस्राव (Bleeding):

गर्भपात के दौरान, रक्तस्राव की संभावना है, जिसके कारण महिला को अत्यधिक ब्लीडिंग हो सकती है।

3.

गर्भस्थ ऊतकों का निकलना (expulsion of fetal tissue):

गर्भपात के साथ, गर्भस्थ ऊतकों का निकलना हो सकता है, जिससे पेट के निचले हिस्से में दर्द और भारीपन का अहसास हो सकता है।

4.

शारीरिक और आत्मिक दुख (Physical and spiritual suffering):

मिसकैरेज के बाद, महिला शारीरिक और आत्मिक दुख में हो सकती है, जिसमें उबाल, उदासी, और आवाज को रोक पाने में कठिनाई शामिल हो सकती है।

5.

वायरल बीमारी के लक्षण (Symptoms of viral disease):

गर्भपात के आसपास, तेज बुखार, ठंड, और शरीर में दर्द की अनुभूति हो सकती है, जो वायरल बीमारी के कारण हो सकती है।

6.

ऐंठन और जी मिचलना:

गर्भपात के लक्षणों में पूरे शरीर में ऐंठन और जी मिचलना भी हो सकता है।

7.

योनि से सफेद गुलाबी रंग का म्यूकस

मिसकैरेज के दौरान, योनि से सफेद गुलाबी रंग का म्यूकस निकलना एक आम लक्षण हो सकता है।

8.

तेजी से वजन का कमी

गर्भपात के बाद, अचानक और तेजी से वजन का कमी हो सकता है, जो गर्भावस्था के लक्षणों से भिन्न हो सकता है।

गर्भावस्था के दौरान इनमें से किसी भी लक्षण का आपको अहसास हो, तो तुरंत अपने डॉक्टर के पास जाएं। यह संभावना है कि गर्भपात के बिना भी ये लक्षण प्रकट हो सकते हैं, लेकिन आपका डॉक्टर परीक्षण करने के बाद ही सुनिश्चित करेगा कि सब कुछ ठीक है या नहीं।

गर्भपात से बचने के लिए क्या करना चाहिए? (What should be done to avoid miscarriage?)

“मिसकैरेज (गर्भपात) को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता, मगर यह आवश्यक है कि, आप एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं। सही समय पर पौष्टिक आहार, उच्च गुणवत्ता वाला रहन-सहन, गर्भ की नियमित जाँच, और अन्य स्वस्थ आदतों पर ध्यान दें। इस प्रकार, आप न केवल गर्भपात से बचेंगे, बल्कि आप और आपका अजात शिशु पूरी तरह से स्वस्थ रहेंगे।”

मिसकैरेज से बचने के लिए निम्नलिखित कदम उठाएं:

  1. स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं

    स्वस्थ आहार, नियमित व्यायाम, और सुनिश्चित करें कि आप सही तरीके से सो रहे हैं।

  2. डॉक्टर की सलाह लें

    गर्भावस्था की योजना बनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें और सही सलाह प्राप्त करें।

  3. सही समय पर प्रेगनेंसी की शुरुआत करें

    यदि आप गर्भधारण करना चाहते हैं, तो सही समय पर प्रेगनेंसी की कोशिश करें।

  4. नियमित चेकअप कराएं

    गर्भावस्था के दौरान नियमित चेकअप करवाएं और डॉक्टर के सुझावों का पालन करें।

  5. धूम्रपान और शराब का त्याग करें

    धूम्रपान और शराब का सेवन न करें, क्योंकि ये मिसकैरेज के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

  6. स्ट्रेस से बचें

    स्ट्रेस को कम करने के लिए ध्यान, योग, और अन्य तंत्रमंत्र अभ्यास करें।

  7. सही आत्म-देखभाल

    अच्छी आत्म-देखभाल और पॉजिटिव मानसिकता बनाए रखने के लिए कोशिश करें।

  8. अधिक जानकारी प्राप्त करें

    मिसकैरेज के कारणों और बचाव के तरीकों के बारे में जानकारी प्राप्त करें।

मिसकैरेज (गर्भपात) हमारे हाथ में नहीं है। स्वस्थ जीवनशैली को अपनाने के बाद भी, कुछ स्थितियों में महिलाएं अपने आपको दोषी मान लेती हैं। लेकिन यह बिलकुल सही नहीं है। 50% मामलों में भ्रूण के गुणसूत्रों में समस्या भ्रूण के विकास में विपदा खड़ी कर सकती है, जिससे आगे बढ़कर गर्भपात का खतरा बढ़ता है। गर्भपात के बाद महिला को समझाना जरूरी है कि यह एक प्रक्रिया है और इसमें उनकी कोई गलती नहीं है।”

गर्भपात के बाद सही होने में कितना समय लगता है? (Recovering from a miscarriage in Hindi)

मिसकैरेज के बाद, महिला के शरीर का पुनर्निर्माण करना उसे गर्भपात के हुए महीनों की संख्या पर निर्भर करता है। आमतौर पर, गर्भपात के बाद, महिला को मासिक धर्म की तरह रक्तस्राव, स्तनों में दर्द और बेचैनी, और पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द का सामना करना पड़ता है।

हालांकि, गर्भधारण करने वाले हार्मोन गर्भपात के बाद कुछ महीनों तक रक्त में बने रह सकते हैं, लेकिन आमतौर पर, तीन से छह हफ्तों के भीतर, आप पूरी तरह से स्वस्थ हो सकती हैं। इसके साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि आप खुद को शारीरिक और भावनात्मक रूप से पूरी तरह से ठीक होने के लिए समय दें।

आइये जानते है इन्ही बातो को विस्तार से-

मिसकैरेज के बाद पीरियड पीरियड क्यों आता हैं?

रक्तस्राव(Bleeding):

गर्भपात के बाद, महिला को मासिक धर्म की तरह रक्तस्राव होता है। यह रक्तस्राव अक्सर अधिक होता है, क्योंकि परियड्स के न आना गर्भवती होना समझाता है, लेकिन कभी-कभी स्थिति यह हो जाती है कि आपका अचानक से मिसकैरेज हो जाए या गर्भपात हो जाए, जिसके कारण भ्रूण को कई बार या तो निकालना पड़ता है या फिर दवाओं के जरिए हटाना पड़ता है, जिससे योनि से अधिक रक्त बहने लगता है|

2. स्तनों में दर्द और बेचैनी

स्तनों में दर्द और बेचैनी गर्भपात के परिणामस्वरूप हो सकती हैं। इस प्रकार की शारीरिक अनुभूतियाँ आमतौर पर हार्मोनल परिवर्तनों और गर्भवती रहने वाले हार्मोनों के असमान्य बदलावों के कारण हो सकती हैं। स्तनों में यह दर्द और बेचैनी उपयुक्त हार्मोनों के संतुलन की कमी के कारण हो सकती हैं, जो गर्भपात के परिणामस्वरूप होती हैं। यह असुविधा या बेचैनी का अहसास कराती है और महिला को शारीरिक और भावनात्मक स्तर पर प्रभावित कर सकती है।

3. पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द

गर्भपात के बाद पेट के निचले हिस्से में होने वाला यह तेज दर्द आमतौर पर गर्भपात के प्रारंभिक चरणों में होता है और इसमें कुछ महिलाएं इसे मासिक धर्म के तुरंत बाद अनुभव कर सकती हैं। यह दर्द गर्भाशय और गर्भाशय मुंह (Cervix) के उत्तरी हिस्से की संवेदनशीलता के कारण हो सकता है, जिसे भ्रूण का निकास होता है।

यह समय के साथ बदल सकता है और इसमें एक तेजी से बढ़ती गति भी हो सकती है, जिससे महिला को बहुत तकलीफ हो सकती है। इसलिए, गर्भपात के बाद, महिला को अगर इस तेज दर्द का सामना करना पड़ता है, तो उसे तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए ताकि सही दिशा में उपचार किया जा सके।

गर्भपात के बाद सही होने में समय महिला के शारीरिक स्वास्थ्य, गर्भपात के तरीक़े, और इसके बाद की देखभाल की आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। आमतौर पर, यह लगभग तीन से छह हफ्तों का समय लेता है ताकि शरीर पूरी तरह से ठीक हो सके। हालांकि, कुछ महिलाएं इस समय सीमा को पार कर सकती हैं और उन्हें अधिक समय लग सकता है। इसलिए, यह सब व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थितिऔर डॉक्टर की सलाह और मार्गदर्शन पर निर्भर करता है।

मिसकैरेज के बाद दोबारा प्रेगनेंट होने के लिए क्या करें ? (what to do for Getting pregnant again in Hindi)

मिसकैरेज के बाद फिर से प्रेगनेंट होना एक बहुत भावनात्मक और चुनौतीपूर्ण समय हो सकता है, लेकिन सही देखभाल और तरीकों के साथ इस मुश्किल समय को पार किया जा सकता है। सबसे पहले महत्वपूर्ण बातआपको यह समझना होगा कि अपने शरीर और मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखें।
अगरआप तैयार हैं फिर से मातृत्व की यात्रा पर जाने के लिए, तो डॉक्टर से मिलें और अपनी स्थिति को साझा करें। वे आपको आपके स्वास्थ्य और मेडिकल इतिहास के आधार पर सही दिशा में मार्गदर्शन कर सकते हैं।
अगर आप दोबारा प्रेग्नेंट होना चाहती हैं तो आपको सही और पूरी मात्रा काआहार लेना बहुत महत्वपूर्ण है, और आपको योग और एक्सरसाइज के लिए भी सकारात्मक रूप से सोचना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी समर्थन लेना महत्वपूर्ण है, और आप अपने पारिवार और दोस्तों से सलाह प्राप्त कर सकती हैं।
जब आप इस मार्गदर्शन का पालन करती हैं, तो आप दोबारा माँ बनने के लिए तैयार हो सकती हैं।यही वह समय समय हैं जो आपके लिए आवश्यक सहारा, देखभाल और प्रेम भरा हो, जिससे आप अपनी जिंदगी की नई शुरुआत कास्वागत फिर से कर सकती हैं।

गर्भपात (मिसकैरिज) से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

– Miscarriage related FAQs

मिसकैरेज के बाद प्रेगनेंसी कब होती है?( When does pregnancy occur after miscarriage?)

‘एक बार एबॉर्शन या मिसकैरिज होने के बाद, बॉडी को पूरी तरह से रिकवर होने के लिए थोड़ा समय देना जरूरी होता है। मिसकैरिज के बाद कंसीव करने के लिए कम से कम दो से तीन महीने का समय देना बेहतर रहेगा। शरीर को पहले जैसी अवस्था में लाने के लिए पौष्टिक आहार के साथ ही मानसिक रूप से तैयार होना भी बहुत जरूरी होता है।

गर्भपात के कितने दिन बाद संबंध बनाना चाहिए?( How many days after abortion should one have sex?)

गर्भपात के बाद, जब आप स्वयं को तैयार महसूस करें, तो आप सेक्सुअल एक्टिविटी पर वापस जा सकती हैं। कुछ मेडिकल प्रोवाइडर्स आपको सुझा सकते हैं कि आप सेक्सुअल एक्टिविटी को फिर से शुरू करने के लिए (या अपनी योनि में कुछ भी डालने के लिए) कुछ समय इंतजार करें, क्योंकि संक्रमण का बहुत ही छोटा खतरा हो सकता है; हालांकि, नए अध्ययन इसे चिकित्सा रूप से आवश्यक नहीं मानते हैं – इसलिए यह आखिरकार आपका निर्णय है कि आप कब सेक्स के लिए तैयार महसूस करती हैं – यहां तक कि शारीरिक और मानसिक दोनों।

गर्भपात के बाद जब आप सेक्सुअल गतिविधियों के साथ फिर से जुड़ती हैं, यह समय और शैली पूरी तरह से आप पर निर्भर करता है। अपने doctor की सलाह को सुनें, अपने मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत आनंद को प्राथमिकता दें, और उससे भी अधिक, अपने आप पर पर विश्वास करें।

बार बार मिसकैरेज क्यों होता है? Why does miscarriage happen again and again?)

“मिसकैरेज” एक स्त्री के गर्भावस्था के दौरान होने वाली एक ऐसी दुखद घटना है जिसमे स्त्री को कई बार पता भी नहीं चलता और उसका गर्भपात हो जाता है।अगर आकड़ो की माने तो 100 फीसदी महिलाओ में से 2 या 3 महिलायें ऐसी होती हैं जिनका बार-बार गर्भपात हो जाता है, अगर इसके पीछे कारण पता करना है तो उन्हें चिकित्सक या डॉक्टर्स के परामर्श लेना चाहिए क्यों कि इस दौरान वह कई टेस्ट भी करवाते है, जिससे पता लगाया जा सके की ऐसा बार-बार क्यों हो रहा हैं जैसे- अनुवांशिक कारण, फाइब्रॉएड की असमानता, गर्भाशय में असमानता ,ब्लडकॉटिंग से जुडी समस्याएँ , इन्फेक्शन, इम्युनिटी का कमजोर होना आदि कई कारण हो सकते हैं।

मिसकैरेज के बाद क्या खाना चाहिए?( What to eat after miscarriage?)

गर्भपात होने के बाद सही आहार बहुत महत्वपूर्ण है, जिससे महिला शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रह सके। यहाँ हम जानेंगे कि गर्भपात होने के बाद महिलाओं को कौन-कौन से आहार खाना चाहिए और कौन-कौन से आहार बचना चाहिए

मिसकैरेज के बाद खाना चाहिए

  1. प्रोटीन से भरपूर आहार: मांस, मूंगफली, दही, पनीर, और दालें जैसे प्रोटीन स्रोतों का सेवन करें।
  2. हरी पत्तियां और सब्जियां: फॉलेटिक एसिड और विटामिनों से भरपूर हरी पत्तियां और सब्जियां खाएं, जैसे कि पालक, मेथी, गाजर, टमाटर, और बैंगन।
  3. फल: सेब, केला, नारंगी, अनार, और अमरूद जैसे फलों का सेवन करें।
  4. दूध और दूध से बने उत्पाद: कैल्शियम के लिए दूध, दही, और पनीर का सेवन करें।
  5. हल्दी और गुड़: हल्दी और गुड़ में अनेक स्वास्थ्य लाभ होते हैं, इसलिए इन्हें अपने आहार में शामिल करें।

मिसकैरेज के बाद नहीं खाना चाहिए

  1. तेज मसाले और तले हुए चीजें: तेज मसाले और तले हुए चीजों से बचें, क्योंकि ये पाचन में कठिनाई पैदा कर सकते हैं।
  2. कॉफ़ी और चाय: अधिक मात्रा में कॉफ़ी और चाय से बचें, क्योंकि ये कैल्शियम को बाधित कर सकते हैं।
  3. अधिक शर्करा युक्त खाद्य: अधिक शर्करा युक्त खाद्य से बचें, क्योंकि इससे वजन बढ़ सकता है और डायबीटीज का खतरा हो सकता है।
  4. भारी वसा वाला खाद्य: तला हुआ और अधिक वसा से भरपूर खाना खाने से बचे ।

मिसकैरेज के बाद क्या करना चाहिए?( What should be done after miscarriage?)

मिसकैरेज के बाद सेक्स करना सुरक्षित हो सकता है, लेकिन दोबारा गर्भधारण के लिए कम से कम दो हफ्ते का इंतजार करना उचित है। मिसकैरेज के बाद महिलायें दो महीने के बाद ओवुलेशन (अंडानुरूपण) कर सकती हैं, लेकिन सामान्यत: नॉर्मल साइकिल का स्थान लेने में दो महीने तक का समय लग सकता है।

इसलिए, मिसकैरेज के बाद, यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि यूट्राइन लाइनिंग (गर्भाशय की ऊतक की सत्रजितता) और प्रेग्नेंसी हार्मोन hCG की स्तिथि में सुधार हो रहा है। आप ब्लड टेस्ट के माध्यम से यह जांच सकती हैं कि hCG हार्मोन नॉर्मल हुआ है या नहीं।

जब महसूस होता है कि गर्भपात में कुछ असफलता हो रही है, यह स्वयं में एक अलग ही दर्द और दुख का अहसास होता है। इस परिस्थिति में, जब हर इच्छा और प्रत्याशा एक नए जीवन की ओर मुड़ रही है, एक आदमी या स्त्री को आत्मसमर्पण और सहानुभूति की आवश्यकता होती है।

गर्भपात के बाद, जब आपमें उन छोटे से जीवन के सपने का अस्तित्व बिगड़ जाता है, तो यह दुखभरा और भावनात्मक समय होता है। मानव जीवन की इस खोई हुई स्वीकृति का आंसू छलक जाता है, और वहां एक रूँधे हुए ह्रदय का आभास होता है।

इस मुश्किल वक्त में, आपको समर्थन और समझ की जरुरत है, चाहे वह परिवार का हो या दोस्तों का। यह समय है जब एक दूसरे के साथ शोक और दुख को साझा करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक-दूसरे का साथ होना एक अधिकारी भावना सृष्टि करता है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं , माँ शब्द अपने आप में बहुत ही ममता से भरा हुआ शब्द हैं जब किसी महिला को पहली बार ये पता लगता है कि वो माँ बनने वाली है तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता इस दौरान दोनों पति और पत्नी अपने आने वाले बच्चे के लिए ढेरो तैयारियाँ करते है और बेसब्री से उसके आने का इंतज़ार करते है पर किसी कारण से उसका “मिसकैरेज” (गर्भपात) हो जाए तो वह अपने आप को दोषी समझने लगती है जो बिल्कुल भी सही बात नहीं है ऐसी स्थिति में परिवार जानो के साथ-साथ उसके पति का भी भरपूर सहयोग मिलना चाहिए ताकि वह इस मिसकैरेज या गर्भपात जैसी गंभीर बीमारी से बाहर निकल सके।

तो यह थीं गर्भपात से जुड़ी ऐसी महत्वपूर्ण बातें जो आपको पता होनी चाहिए, हम पेरेंटिंग से संबंधित इसी प्रकार की और जानकारियाँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। अगर आपके पास कोई अन्य सुझाव और टिपण्णी हैं तो कृपया हमसे जरूर शेयर करें।

  • Reference links (keep these links inactive) at bottom
  •  https://www.tv9hindi.com/health/pregnancy-and-child-care/why-does-miscarriage-happen-understand-these-5-big-reasons-and-take-precautions-788919.htm
  •  https://www.healthunbox.com/miscarriage-causes-symptoms-in-hindi/
  •  https://www.myupchar.com/pregnancy/miscarriage-in-hindi/recurrent-miscarriag
  •  https://www.hindiram.com/apurn-garbhpaat-ke-lakshan-or-upchar.html

फाइब्रॉइडस सिकुड़ने के लिए कौन-कौन से आहार चुनें ?

Foods to shrink fibroids in Hindi/Diet Plan for Uterine Lumps and Infertility in Hindi

Synopsis: फाइब्रॉइडस सिकुड़ने के लिए कौन-कौन से आहार चुनें ? गर्भाशय की गांठ और बाँझपन के लिए आहार योजना

फाइब्रॉइड क्या होते है ? किन कारणों से होते है यह सब हमने आपको हमारे पिछले आर्टिकल में बताया।

अगर आप इस आर्टिकल से जुडी जानकारी को हासिल करना चाहते है तो आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते है।

परतुं आज के इस आर्टिकल में हम आपको ऐसे खाद्य पदार्थो को अपनी डाइट में शामिल करने की बात कर रहे हैं , जिनकी सहायता से फाइब्रॉइड की समस्या से झूझ रही महिलाये बिना दवाइयाँ लिए फाइब्रॉइड (Cysts ) के दर्द को कम कर सकती है क्यों कि यह सभी खाद्य पदार्थ फाइब्रॉइडस को सिकुड़ने में मदद करेंगे जिससे आपको इसके भयंकर दर्द से राहत मिलेगी।

साथ ही यहाँ हम आपके साथ एक ऐसी दिनचर्या शेयर कर रहे हैं जिसे आप अपनाकर घर बैठे इस फाइब्रॉइड समस्या से निजात पा सकते है।

चलिए बिना इंतज़ार किये  जानकारी को और अधिक हासिल करते है …

  • स्त्री रोग, बांझपन, और गर्भाशय में गांठ के लिए आहार और दिनचर्या
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  • आवश्यक आहार जो लेना चाहिए
  • आवश्यक आहार जो नहीं लेना चाहिए

स्त्री रोग, बांझपन, और गर्भाशय में गांठ के लिए आहार और दिनचर्या

स्त्री रोग, बांझपन, और गर्भाशय में गांठ के लिए दिनचर्या

समय के अनुसार शुद्ध शाकाहार (भोजन) की योजना अपनाये

जैसे –

समय (टाइम)                                            शुद्ध शाकाहार (भोजन) की योजना

नाश्ते का समय

(9:00  से 9:30 )

उत्पम /उपमा /नमक कम नमकीन दलिया /2-3 इडली/मूंग दाल खिचड़ी/ अंकुरित अनाज /1-2 पतली रोटी + 1 कटोरी सब्जी + 1 कटोरी दाल /1 प्लेट ताजे फलों कासलाद (आम, अनार, केला,पपीता, सेब)/कार्नफ्लेक्स

दिन का भोजन समय

(01:00-02:00 PM)

2 -3 पतली रोटियां (मिश्रित अनाज आटा ) + 1 कप चावल(मांड रहित)+1 कटोरी दाल+ 1 छोटी प्लेट सब्जी  (रेशेदार, पत्तेदार, ताजी ) + 1 कटोरी सब्जियो कासलाद+मट्ठा |              

दिन का भोजन समय                             

(01:00-02:00 PM)

2 -3 पतली रोटियां (मिश्रित अनाज आटा ) + 1 कपचावल(मांड रहित)+1 कटोरी दाल+ 1 छोटी प्लेट सब्जी (रेशेदार, पत्तेदार, ताजी ) + 1 कटोरी सब्जियो का सलाद+मट्ठा |

रात्रि का भोजन समय              

(7: 00 – 8:00 PM)

1-2 पतली रोटियां ( मिश्रित अनाज आटा ) + 1 कटोरी सब्जी ( रेशेदार, ताजी,पत्तेदार )+1 कप चावल (मांड रहित)+ 1 कटोरी दाल + 1 कटोरी सब्जियो  का सलाद +मट्ठा।

सोने से आधा घंटा  पहले                 

(10:00 pm)

1 गिलास दूध

स्त्री रोग, बांझपन, और गर्भाशय में गांठ के लिए आहार

आवश्यक आहार जो लेना चाहिए

अनाज:  हो सके तो पुराना चावल, ओट्स, जौ

दालें: अगर आप दालों का सेवन करना चाहती है तो  मूंग, मसूर, काबुली चना आहार में शामिल कर सकती है।

सब्जियां: पत्तागोभी, ब्रोकॉली, बीन्स, गाजर, शकरकंद, कददू, चुकुन्दर व मूली, शलजम, पालक,मौसमानुसार सब्जियां ले सकती हैं।

फल: -सेब, अनार, केला,आम, पपीता |

अन्य आहार:  बादाम, लहसुन,  गेहू का अंकुर, ग्रीन–टी |

आवश्यक आहार जो नहीं लेना चाहिए

अनाज: इस बात का ध्यान रखें नया चावल, मैदा न लें।

दालें:  उड़द दाल का प्रयोग न करें क्यों कि इसका प्रयोग पेट में गैस बना सकता है जो फाइब्रॉइड के लिए दर्दनाक हो.

सब्जियां: आलू तथा अन्य कन्द मूल, बैंगन,

फल: खट्टे फल– संतरा, अंगूर, नीम्बू,लीसोरा,

कैसी जीवन शैली अपनाये ?

  1. सुबह होते ही दैनिक कार्यो से निर्वत्त होकर योग ,प्राणायाम पर विशेष ध्यान दें।
  2. अपने लिए एक घंटा जरूर निकालें।
  3. प्राणायाम पर विशेष ध्यान दे जिसमें आप भस्त्रिका, अनुलोम विलोम,बाह्यप्राणायाम, भ्रामरी, उदगीथ, उज्जायी करें।
  4. योग में प्रमुख रूप से नौकासन, कंधरासन, सर्वांगासन,बज्रासन, गोमुखासन,उत्तानपादासन करें।
  5. 10-15 मिनट मैडिटेशन करें जिसमे आप अपने आप के लिए स्वस्थ शरीर की कामना करते हो जैसे-
  • मैं बहुत स्वस्थ आत्मा हूँ।
  • मेरी सारी बीमारियाँ ठीक हो चुकी है।

 

  • ध्यान देने योग्य बात:-मासिक धर्म के समय योगा और प्राणायाम बिलकुल ना करें।

गर्भाशय गांठ और बाँझपन के लिए आवश्यक मार्गदर्शन

  • इन रोगों का मुख्य कारण मोटापा हो सकता है। शर्करा युक्त आहार से बचें, स्टार्च से भरपूर भोजन ना करें, और अधिक मात्रा में पानी पिएं।
  • गर्भनिरोधक दवाएं सिर्फ डॉक्टर की सलाह से ही लें, प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधनों से बचें, और प्लास्टिक से बंद किए जाने वाले खाद्यों का सेवन न करें।
  • रोजाना योग और प्राणायाम का अभ्यास करें अपने दैहिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए।

नियमित रूप से अपनाएं

  1. प्रतिदिन ध्यान और योग का अभ्यास करें।
  2. ताजगी और हल्के गरम भोजन का अवश्य सेवन करें।
  3. दिन में तीन से चार बार भोजन करें।
  4. भोजन को धीरे-धीरे शांत मन से ग्रहण करें, सकारात्मक और खुश मन से भोजन करें।
  5. अत्यधिक भोजन से बचें
  6. किसी भी समय भोजन को छोड़े नहीं।
  7. हफ्ते में एक बार उपवास करें।
  8. अमाशय का 1/3rd या 1/4th हिस्सा खाली रखें।
  9. भोजन को अच्छे से चबाकर और धीरे-धीरे खाएं।
  10. भोजन करने के बाद 3-5 मिनट टहलें।
  11. जहाँ तक हो सूर्योदय से पहले उठकर समय पर जाग जाएं [6:00 – 6:30AM]
  12. भोजन करने के बाद थोड़ा समय टहले और रात में सही समय पर नींद लें [9:30- 7:30 PM]
  13. प्रतिदिन दो बार ब्रश करें।
  14. प्रतिदिन जीव्हा।जीभ को साफ़ करें।

आशा है आपको इस आर्टिकल में फाइब्रॉएडस को सिकोड़ने (Foods to shrink fibroids in Hindi )से सम्बंधित लगभग सभी जानकारियाँ प्राप्त हो चुकी होंगी।

अगर आपके पास कोई अन्य सुझाव और टिपण्णी हैं, तो कृपया हमसे जरूर साझा करें। हम आपके साथ हैं और आपके सारे सवालों के जवाब आप तक लाने की पूरी कोशिश करेंगे।

Reference link

https://www.1mg.com/hi/patanjali/diet-plan-for-fibroid-cysts-and-infertility/

फाइब्रॉइडस क्या हैं फाइब्रॉइडस क्यों होते हैं?

Synopsis: फाइब्रॉइडस (Uterine Fibroids) क्या हैं? क्यों होते हैं? जानिए फाइब्रॉइडस के कारण, लक्षण, प्रकार, टेस्टऔर उपचार

फाइब्रॉइडस क्या हैं? फाइब्रॉइडस गर्भाशय के अंदर पाए जाते है, सामान्य बोल चाल की भाषा में या हिंदी में आप इसे गांठ के रूप में समझ सकते है। जो की गर्भाशय (Uterus) की सतहों पर पाई जाती हैं और यह गांठे एक छोटे तिल के आकर से लेकर बड़े दाने बराबर हो  सकती है जिन्हें “फाइब्रॉइडस” कहा जाता है।

  • फाइब्रॉइडस क्यों होते है?
  • फाइब्रॉइड्स(Uterine Fibroids) के कारण
  • फाइब्रॉइड(Uterine Fibroids) होने के लक्षण
  • फाइब्रॉइड्स या (यूटरीन फाइब्रॉएड) के प्रकार
  • फाइब्रॉइड परीक्षण
  • आपके सवाल जवाब

फाइब्रॉइडस क्यों होते है?

आख्रिर फाइब्रॉइडस हो क्यों जाते है और इसके पीछे क्या ऐसा कारण है जो महिलाओं के लिए इतना गभींर और सोचने को मज़बूर कर देने वाला विषय हैं | वैसे तो डरने वाली कोई बात नहीं है क्यों कि ये फाइब्रॉइडस “गैर-कैंसरीय” होते है, जो की गर्भाशय के अंदर मांसपेशियों (Muscles) में होने वाले रूपरेखात्मक बदलाव (मोरफोलॉजिक्ल) के कारण होते हैं जिन्हे ट्यूमर या गांठ कहते है और संक्षिप्त में इन्हें फाइब्रॉइडस कहा जाता है और इसका सामना किसी भी महिला को प्रेगनेंसी या बेबी प्लान करने के दौरान पड़ सकता है।

यह फाइब्रॉइडस अक्सर 30 साल से अधिक उम्र की महिलाओ में देखने को मिलते हैं पर आज कल के अनियमित लाइफ स्टाईल के चलते यह 25 से 30 उम्र की महिलाओं में भी देखने को मिल जाते हैं

आइए जानते हैं इसके कारण, लक्षण, प्रकार, टेस्ट्स और सावधानियों के बारे में

फाइब्रॉइड्स (Uterine Fibroids) के कारण- (Uterine Fibroids ke karan in hindi / Causes of Uterine Fibroids)

फाइब्रॉइड्स होने के विभिन्न  कारण हो सकते है चलिए जानते है इनके विषय में विस्तार से …

बढ़ती हुई आयु : जैसे-जैसे महिलाओ की उम्र बढ़ती जाती है फाइब्रॉइड्स बनने की संभावना भी बढ़ती जाती हैं| अधिकतर मोटे शरीर वाली महिलाओं में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती हैं ।

हॉर्मोनल परिवर्तन : उम्र बढ़ने के दौरान कई हार्मोनल चेंजेस भी शरीर में होते है जिसकी वजह से बॉडी कुछ विशेष प्रकार के हार्मोन जैसे एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन उत्पन्न करती है इन्हीं हार्मोन्स के परिवर्तन के कारण और असंतुलन से फाइब्रॉइडस बनना शुरू हो जाते  है।

जीनेटिक कारण

अगर परिवार में पहले से ही किसी को फाइब्रॉइड्स की समस्या हो तो यह अनुवांशिक वारिस्ता फाइब्रॉइड्स के बढ़ने का कारण बन सकती है।

हृदय से संबंधित रोग

रिसर्च के अनुसार यह देखा गया है कि जिन महिलाओ को ह्दय संबंधी बीमारियाँ या रिस्क होती है, उनमें फाइब्रॉइड्स उत्पन्न होने की संभावना बड़ जाती हैं ।

आहार और व्यायाम

आहार और व्यायाम की अनियमितता के कारण यह समस्या और अधिक बढ़ जाती है अनियमित खान-पान और अपने शरीर का ख्याल न रखना ,रोजाना व्यायाम को अपनी जिंदगी में शामिल न करना यह सभी प्रमुख कारण है फाइब्रॉइड्स को जन्म देने के लिए ।

कुछ खाद्य पदार्थ ऐसे हैं जो हमें फाइब्रॉएड की समस्या में राहत दिलाने में योगदान दे सकते हैं

 अगर आप में से किसी भी महिला को इनमे से कोई भी संकेत नज़र आता हो तो तुरंत अपने डॉक्टर्स से परामर्श लेना चाहिए ताकि समय पर इसका इलाज़ हो सके।

फाइब्रॉइड होने के लक्षण –(Uterine Fibroids Fibroids ke lakshan in hindi / Symptoms of Uterine Fibroids)

फाइब्रॉइड महिलाओं में होने वाला एक सामान्य स्त्री रोग है, वैसे तो इसके कई सामान्य लक्षण है, जो महिलाओ को पता भी नहीं चल पाते और वह जाने अनजाने में इन्हें नज़र अंदाज़ करने लगती है पर यह समस्या गंभीर तब बन जाती है, जब ये सभी लक्षण जरुरत से ज्यादा तीव्र रूप ले लेते हैं ,जो गर्भाशय में उत्पन्न होने वाली एक छोटी सी गांठ की बनावट में होता है। जो फाइब्रॉइड कहलाता हैं।

फाइब्रॉइड के कुछ मुख्य लक्षण है जो निम्नलिखित हैं:

1. पेट में दर्द या दबाव का होना -फाइब्रॉइड अधिकतर गर्भाशय की सतहों या किनारों पर पाए जाते है इसके अनियमित बदलते आकर कई बार महिलाओ के लिए दुःख का कारण बन जाते है जिसकी वजह से पेट में दर्द या दबाव महसूस हो सकता है, जो कभी-कभी पेट की किनारे तक पहुंच सकता है।

2. मासिक धर्म में असमानता– मासिक धर्म में असमानता: महिलाओ में पीरियड्स का आना स्वाभाविक है जिसकी वजह से ही वह गर्भधारण कर पाती है, परंतु अगर गर्भाशय के अंदर ही प्रॉब्लम होने लग जाए और उनका मासिक धर्म बिगड़ने लगे याने कभी ज़रूरत से अधिक ब्लीडिंग और कभी बहुत ही कम ब्लीडिंग होने लगे तो आपको समझना होगा की यह समस्या कोई गंभीर समस्या तो नहीं ! इसके लिए आपको तुरंत अपने डॉक्टर्स से संपर्क करना चाहिए |

3. पेट का बढ़ता आकार– अगर गर्भाशय के अंदर फाइब्रॉइड्स के आकर नॉर्मल आकर से कुछ हद तक बढ़े होते है, तो फाइब्रॉइड के कारण पेट का आकार धीरे- धीरे बढ़ सकता है, जिससे महिलाओं को लग सकता है कि वे गर्भवती हैं।

4. सेक्स से जुड़ी समस्याएं– सेक्स किसी भी पति पत्नी को जोड़ने का प्रमुख कारण हैं पर अगर सेक्स से दौरान किसी महिला को असहजता महसूस हो और अत्यधिक दर्द महसूस हो तो डॉक्टर्स से संपर्क ज़रूर करना चाहिए क्यों कि फाइब्रॉइड के कारण सेक्स के दौरान या बाद में दर्द या असहजता महसूस हो सकती है।

5. यूरिन(पेशाब) करने में समस्या- यूरिन(पेशाब) का आना किसी भी इंसान के लिए एक स्वाभाविक प्रक्रिया है परंतु अगर आपको बार-बार यूरिन के लिए जाना पड़ रहा हो तो आपको सचेत हो जाना चाहिए, क्यों कि यह समस्या बड़े फाइब्रॉइड के कारण भी हो सकती है,जैसे कि बार-बार पेशाब आने का महसूस होना और पेशाब करने में दर्द होना।

ये सभी प्रमुख लक्षण फाइब्रॉइड होने की पुष्टि करते है अगर आप में से किसी को भी इन सभी लक्षणों में से कोई भी लक्षण नज़र आता हो तो तुरंत अपने डॉक्टर्स या चिकित्सक के पास जाये और उनसे इसके निवारण के उपाए पूछे वह आपको इसके निवारण के लिए सही सलाह देंगे ।

फाइब्रॉइड्स या (यूटरीन फाइब्रॉएड) के प्रकार –(Types of uterine fibroids in hindi/Types of uterine fibroids)

जैसा की हमने अभी तक जाना फाइब्रॉइड्स गर्भाशय के भिन्न हिस्सों में उत्पन्न होने वाली गाठें होती हैं और अनियमित बढ़ने और घटने के आकर को लेकर इन्हें विभिन्न प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है।

गर्भाशय की एक गैर-कैंसरीय ग्रोथ होती है जिसे यूटरीन फाइब्रोइड कहा जाता है। जो अक्सर बच्चे के जन्म के वर्षों के दौरान दिखाई देती है। इसे लियोमायोमास या मायोमा भी कहा जाता है। यूटेरिन या गर्भाशय फाइब्रोइड गर्भाशय कैंसर के जोखिम से संबंधित नहीं है, और यह कभी भी कैंसर में विकसित नहीं होती है।

यूटरीन फाइब्रॉएड के प्रकार निम्नलिखित हैं-

यूटरीन फाइब्रॉएड मुख्यतः चार (4) प्रकार के होते है ।

1.सबसेरोसल फाइब्रॉइड्स (Subserosal Fibroids)– इस प्रकार के फाइब्रॉइड्स मुख्यतः गर्भाशय की बाहरी सतह या किनारो पर होते हैं और अधिकतर पेट की ओर बढ़ते  हैं। ये गांठें महसूस तो होती हैं, लेकिन आमतौर पर गर्भाशय के भीतरी या आंतरिक हिस्सों में नहीं होतीं।

सबसेरोसल फाइब्रॉइड के विशिष्ट लक्षणों में पीरियड्स के दौरान हैवी ब्लीडिंग, गर्भाशय के बड़े आकार के कारण, और आस-पास के अंगों पर दबाव के लक्षण, जैसे बारा-बार पेशाब आना, कब्ज की शिकायत या मल त्यागने में परेशानी , शामिल हैं।

2.इंट्राम्योटल फाइब्रॉइड्स (Intramural Fibroids)– इस प्रकार के फाइब्रॉइड्स गर्भाशय की दीवार के भीतर याने अंदर होते हैं और यह गर्भाशय केअधिकांश हिस्से को धारित करते हैं। इन्हें आमतौर पर गर्भाशय के अंदर  माध्यम आकर  के रूप में देखा जा सकता हैं और वे महिलाओं के लिए समस्याएं उत्पन्न कर सकते हैं।

इसके लक्षणों में भारी मासिक रक्तस्राव, लंबे समय तक चलने वाले पीरियड्स, पीरियड्स के बीच में रक्तस्राव, दबाव संबंधित लक्षण, बांझपन और गर्भस्राव शामिल हैं।

3.सबम्योसल फाइब्रॉइड्स (Submucosal Fibroids)– ये फाइब्रॉइड्स गर्भाशय की अंदरूनी सतह के करीब होते हैं और नार्मल आकर के मुकाबले बड़े होते हैं। यह फाइब्रॉइड्स गर्भाशय के सबसे ऊपरी हिस्से याने (यूट्रस के अपर डोमिनल)हिस्से  में पाये जाते है और इनका सीधा प्रभाव गर्भाशय की अंदरूनी स्थिति पर हो सकता है।

सबम्यूकोस फाइब्रॉइड किसी भी गर्भवती महिला को दो तरह से प्रभावित कर सकता है। पहले यह गर्भवती होने में रुकावट पैदा कर सकता है और अगर गर्भ धारण होता भी  है तो इसके कारण गर्भपात होने की संभावना बड़ जाती है, जो एक सामान्य समस्या हो सकती है।

4.पेडुंक्युलेटेड फाइब्रॉइड– पेडुंक्युलेटेड फाइब्रॉइड को ऊपर के प्रकारों से अलग नहीं माना जाता है, लेकिन सबसेरल या सबम्यूकोसल फाइब्रॉइड से इसमें भिन्नता होती है। इन्हें यूटेरस की दीवारों के बाहर, बाहर (सबसेरोसल) या गर्भाशय के अंदर (सबम्यूकोसल) एक डंठल पर उगते हुए देखा जा सकता है।

पेडुंक्युलेटेड सबसेरोसल फाइब्रॉइड जब छोटे होते हैं तो इनके लक्षण आमतौर पर हल्के होते हैं। वहीं पेडुंक्युलेटेड सबम्यूकोसल फाइब्रॉइड के लक्षण तीव्र होते हैं और अधिकतर बांझपन का कारण बन सकते हैं।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि गंभीर स्थिति में, फाइब्रॉइड्स इतने बड़े हो सकते हैं कि वे रिब केज याने पसलियों तक पहुंच जाते हैं, जिससे पीड़ित महिला का वजन बढ़ने लगता है।इन प्रकारों के फाइब्रॉइड्स का सही अध्ययन और विशेष चिकित्सकीय सलाह से उपयुक्त इलाज तय किया जा सकता है।

फाइब्रॉइड परीक्षण – (Fibroid Diagnosis in hindi)

फाइब्रॉएड के बारे में पता करने के लिए कौन -कौन से टेस्ट कराना चाहिए ?

आइए जानते हैं –

फाइब्रॉइड्स के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए डॉक्टर्स विभिन्न टेस्ट्स करा सकते  है।

जैसे कि:-

  • गांठ की जाँच (पेल्विक एचो)– गर्भाशय क्षेत्र में फाइब्रॉइड्स को देखने के लिए पेल्विक एचो (Pelvic Ultrasound) टेस्ट किया जा सकता है। इससे फाइब्रॉइड्स का स्थान, आकार, और संख्या का पता चलता है।
  • मैग्नेटिक रेजनेंस इमेजिंग (MRI) – MRI स्कैन गर्भाशय के क्षेत्र की विस्तृत छवियाँ प्रदान करता है, जिससे फाइब्रॉइड्स की स्थिति को और अच्छे से देखा जा सकता है।
  • कंप्यूटेड टॉमोग्राफी (CT) स्कैन– यह एक और तकनीकी तरीका है जो गर्भाशय क्षेत्र की त्वचा को देखने में मदद कर सकता है।
  • सोनोहिस्टेरोग्राफी- इस टेस्ट में गर्भाशय को विस्तार से दिखाने के लिए सोनोहिस्टेरोग्राफी टेस्ट किया जा सकता है। अब आप सोच रहे होंगे ये कैसा टेस्ट होता है ? तो हम आपको बता दें सोनोहिस्टेरोग्राफी एक चिकित्सा तकनीक है जिसमें गर्भाशय को विस्तार से देखने के लिए शब्द “सोनो” (ध्वनि) और “हिस्टेरोग्राफी” (गर्भाशय की चित्रण तकनीक) का संयोजन है। इस तकनीक का उपयोग गर्भाशय की स्वस्थता और संरचना की जांच के लिए किया जाता है।
  • हिस्टेरोस्कोपी – यह एक विशेष इंस्ट्रूमेंट के साथ किया जाता है, जिससे डॉक्टर गर्भाशय की अंदरूनी स्थिति को देख सकते है।

इन टेस्ट्स के माध्यम से डॉक्टर फाइब्रॉइड्स की स्थिति का सही और विशेष विवरण प्राप्त कर सकते  है, जिससे सही उपचार की योजना तैयार की जा सकती है।

यूटेरिन फाइब्रॉइड का उपचार- (Treatment of uterine fibroids)

यूटेरिन फाइब्रॉइड्स का इलाज(उपचार) महिला के स्वास्थ की स्थिति , फाइब्रॉइड्स के आकार और लक्षणों के आधार पर निर्भर करता है। अगर इसके उपचार के विषय में बात की जाये तो  कुछ ऐसे  सामान्य तरीके हैं जो डॉक्टर या चिकित्सक, यूटेरिन फाइब्रॉइड्स के इलाज के लिए सुझा सकते हैं:

जैसे –

दवाओं का उपयोग कर – यूटेरिन फाइब्रॉइड्स  के मामूली लक्षणों के लिए डॉक्टर अक्सर कुछ दवाओं के सुझाव आपको देते है जो फाइब्रॉइड्स  को कुछ हद तक कम करने में मदद देते है इसमें कई हॉर्मोनल दवाएं या अन्य दवाएं शामिल हो सकती हैं।

ऑपरेटिव इलाज-यदि फाइब्रॉइड्स के आकर नॉर्मल आकर से बड़े होते हो या लक्षण गंभीर हो, तो सर्जरी का सुझाव दिया जाता है। इसके अंतर्गत हिस्टेरेक्टोमी याने (गर्भाशय की पूरी निकासी) और माइोमेक्टोमी याने (फाइब्रॉइड्स की हटाई की जाती हैं) आदि शामिल हो सकते  हैं।

इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी – यह एक नई आधुनिक तकनीक है जिसमें रेडिओफ्रेक्वेंसी या लेजर इंटरवेंशन की सहायता से फाइब्रॉइड्स को नष्ट किया जाता है, बिना किसी सर्जरी के।

हॉर्मोनल उपचार– इस तकनीक में  फाइब्रॉइड्स के बढ़ते हुए विकास या ग्रोथ को कंट्रोल करने के लिए बर्थ कंट्रोल पिल्स और अन्य हॉर्मोनल तकनीकों का सहारा लेकर उपचारकिया जाता है।

इन उपायों पर विचार करने से पहले, किसी भी महिला को अपनी स्वाथ्य स्थिति के आधार पर चिकित्सक से परामर्श ले लेना चाहिए। ताकि फाइब्रॉइड्स  के उचित इलाज  के लिए सही उपचार को चुना जा सके।

आपके सवाल जवाब (Fibroid FAQs)

1. फाइब्रॉएड का मुख्य कारण क्या है ? (What is the main cause of fibroids?)

फाइब्रॉएड होने  का मुख्य कारण हार्मोनल  चेंजेस  और आनुवंशिकी है, शरीर में उपस्थित  एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन वे हार्मोन हैं जो हर महीने आपके मासिक धर्म के दौरान आपके गर्भाशय की परत को मोटा बनाते हैं। जिससे फाइब्रॉएड के विकास पर भी प्रभाव पड़ने लड़ता लगता हैं और पेट बढ़ने का खतरा बड़ जाता हैं।

2. यदि फाइब्रॉएड का इलाज न किया जाए तो क्या होगा?( What happens if fibroids go untreated?)

यदि फाइब्रॉएड का इलाज न किया जाए तो अधिक मात्रा में रक्तस्त्राव (ब्लीडिंग) की संभावना बड़ जाएगी और समय पर इसका  उपचार न किया जाने पर एनीमिया हो सकता है। वैसे तो  फाइब्रॉएड कैंसर से मुक्त होते हैं, लेकिन शायद ही कभी-कभी वे कैंसर के कारण बन सकते हैं। अगर समय पर इसका पता नहीं लगाया गया तो वह महिलाओं में बांझपन का कारण भी बन सकता  है।

3.क्या कोई महिला फाइब्रॉएड के साथ रह सकती है?(Can a woman live with fibroids?)

फाइब्रॉएड अक्सर सौम्य होते हैं, जो कैंसरयुक्त नहीं होते। जो महिलाएं इसमें लक्षण अनुभव करती हैं, उन्हें फाइब्रॉएड के साथ रहना कभी-कभी मुश्किल लग सकता है, जैसे कि दर्द और भारी मासिक धर्म रक्तस्राव।

4.मैं फाइब्रॉएड को प्राकृतिक तरीके से कैसे कम कर सकती हूँ?( How can I reduce fibroids naturally?)

हाल ही में एक अध्ययन में यह पाया गया है कि सेब और टमाटर जैसे फलों और ब्रोकोली और पत्तागोभी जैसी रेशेदार सब्जियों का सेवन करने से फाइब्रॉएड के विकसित होने का खतरा कम हो सकता है। और, जैविक फल और सब्जियां तथा साबुत अनाज से बने आहार का सेवन करने से फाइब्रॉएड को बहुत हद तक कम किया जा सकता है।

5. मैं अपने फाइब्रॉएड की जांच को घर पर कैसे कर सकती हूँ?( How can I check my fibroids at home?)

कैसे पहचानें कि आपको फाइब्रॉएड है?( How to recognize if you have fibroids?)

  • आपके मासिक धर्म के बीच या उसके दौरान भारी और लंबे समय तक मासिक धर्म।
  • एनीमिया, जिससे थकान हो सकती है।
  • संभोग के दौरान दर्द।
  • जल्दी पेशाब आना।
  • कब्ज और/या सूजन।
  • आपके श्रोणि या पीठ के निचले हिस्से में दर्द।
  • मासिक धर्म में ऐंठन का बढ़ना।
  • पेट में सूजन।

6. क्या मैं फाइब्रॉएड के साथ गर्भवती हो सकती हूं ?(Can I get pregnant with fibroids?)

हाँ, कई फाइब्रॉएड वाली महिलाएं गर्भवती हो सकती हैं। लेकिन स्वस्थ गर्भावस्था की संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए, आप अपने डॉक्टर के साथ अपनी प्रायोरिटी और माँ बनने की चर्चा कर सकती है। यदि फाइब्रॉएड आपके जीवन की गुणवत्ता पर प्रभाव डाल रहा है, तो एक स्त्री रोग विशेषज्ञ(Gynecologist) सर्जन उपचार विकल्पों पर चर्चा कर सकता है जो आपकी प्रजनन क्षमता को बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

7. किस आकार के फाइब्रॉएड को सर्जरी की आवश्यकता है? (What size fibroids need surgery?)

जिन महिलाओं के फाइब्रॉएड का व्यास 3 सेमी से अधिक है, जिन्हें महत्वपूर्ण लक्षण, दर्द या दबाव होता है, और जो अपने गर्भाशय को बनाए रखना चाहती हैं दवा का उपयोग सिर्फ लक्षणों को सुधारने या सर्जरी से पहले फाइब्रॉएड को कम करने के लिए किया जा सकता है।

8. फाइब्रॉएड का कौन सा आकार सामान्य है ?( Which size of fibroid is normal?)

छोटा फाइब्रॉएड – लंबाई 1-5 सेमी से कम (मटर से छोटे चेरी के आकार का) मध्यम फाइब्रॉएड – 5 सेमी – 10 सेमी (आलूबुखारे से बड़े संतरे के आकार का) बड़ा फाइब्रॉएड – 10 सेमी या अधिक (एक अंगूर और उससे ऊपर के आकार का)

9. फाइब्रॉएड के लिए क्या नहीं खाना चाहिए ? (What not to eat for fibroids?)

  • अत्यधिक वसा युक्त भोजन ,प्रोसेस्ड मांस नहीं खाना चाहिए।
  • विभिन्न प्रकार की चीनी से बने खाद्य पदार्थ।
  • ऊपरी नमक।
  • अत्यधिक सोडियम से भरपूर खाद्य पदार्थ।
  • शर्करा और अन्य मिठे पेय।
  • एक्स्ट्रा कैलोरी नहीं लेना चाहिए।
  • लाल मांसहारी भोजन।

सबसे आखरी और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जो हर महिला के मन में आता है।

10. क्या आप उंगली से फाइब्रॉएड महसूस कर सकते हैं ?(Can you feel fibroids with finger?)

आपकी उंगली से फाइब्रॉएड को बाहरी रूप से महसूस करना संभवतः मुश्किल हो सकता है। हालांकि, आपका डॉक्टर पेल्विक परीक्षण के दौरान फाइब्रॉएड को महसूस कर सकता है। ध्यान रखें कि यह हमेशा संभव नहीं होता है, क्योंकि सभी फाइब्रॉएड गर्भाशय के सुलभ क्षेत्रों में स्थित नहीं होते हैं।

आशा है आपको इस आर्टिकल में फाइब्रॉएड से सम्बंधित लगभग सभी  जानकारियाँ प्राप्त हो चुकी होंगी।
अगर आपके पास कोई अन्य सुझाव और टिपण्णी हैं, तो कृपया हमसे जरूर साझा करें। हम आपके साथ हैं और आपके सारे सवालों के जवाब आप तक लाने की पूरी कोशिश करेंगे।

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